अपने पिता दरबारी लाल पटेल के साथ व भाई के साथ रवि नंदन

अपने पिता दरबारी लाल पटेल के साथ व भाई के साथ रवि नंदन

शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

पैरों की लयात्मकता में बरसा संगीत

महोबा, स्टाफ रिपोर्टर : विलक्षण. अद्भुत की आवाजों के साथ ही तालियों की गड़गड़ाहट .. जी हां, खजुराहो के चंदेली मंदिर समूह के ओपन सभागार में जैसे ही घुंघरूओं से बंधे पैरों की लयात्मकता बढ़ी वैसे ही उपस्थित लोगों के हाथों से तालियों की गूंज सुनाई देने लगी। उमा सत्यनारायण की वरिष्ठ शिष्या माने जाने वाली अन्वेषा दास के द्वारा भरतनाट्यम नृत्य के दौरान 'अरंगेत्रम' के दौरान तो लोग मंत्र मुग्ध हो गए, ऐसा लगा कि सैकड़ों लोग सांस रोककर नृत्य का आनंद ले रहे हैं।




ओडिसा की रहने वाली चेन्नई में पली बढ़ी अन्वेषा दास के नृत्य की विशेषता उनका भाव प्रवण अभिनय था। इसके पश्चात ओडिसी के सुविख्यात गुरु केलु चरण महापात्र, कुमकुम मोहन्ती, मायाधर राउत के शिष्य पूर्णा श्री राउत व लकी मोहंती ने जब युगल नृत्य प्रस्तुत किया तो उसमें उड़िया छाप साफ दिखाई दी। नृत्य में भगवान जगन्नाथ की आराधना साफ झलकी। मुद्राओं और चितवन के साथ पैरों की थिरकन बिलकुल तबले की थापें गिनी जा सकती थी। इस बीच बलभद्र और सुभद्रा का संवाद भी काफी सराहा गया। डा. वेंकट वेम्पति व वेम्पति रवि शंकर का कुचिपुड़ी नृत्य न केवल आकर्षक मुद्राओं के लिए दर्शनीय बना बल्कि उनका जोश और पथ संचलन दर्शकों की तालियों का कारण बना। खजुराहो नृत्य उत्सव की अंतिम प्रस्तुति के दौरान दर्शकों का उत्साह इतना बढ़ा कि वह लोग खड़े होकर देर तक तालियां बजाते रहे। स्थानीय दर्शकों के अलावा फ्रांस, जर्मनी, चेकोस्लाविया, नामीबिया, ब्राजील के अलावा तमाम देशों के दर्शक मौजूद रहे।

मंगलवार, 22 जनवरी 2013

जब भैसों को खिलाएं पंजीरी तो कैसे बनें बेटियां 'सबला'

संदीप रिछारिया, महोबा: बेटियां युवती से महिला बनने की प्रक्रिया की बारीकियां तो सीखने में रुचि दिखा रही हैं, पर शरीर को स्वस्थ रखने का माध्यम 'पुष्टाहार' भैंस-गायों के हवाले कर रही हैं। यह नजारा केवल एक गांव का नहीं बल्कि हर गांव व गली में ऐसे दृश्य आम हैं। सबला को परवान चढ़ाने में लगे अधिकारी भी इस बात से भौचक हैं कि 'एमाइलेज रिच एनर्जी' का दुरुपयोग आखिर हो क्यों रहा है? अधिकारी कहते हैं कि शायद योजना के प्रसार प्रचार या कार्यकत्रियों के समझाने में कहीं न कहीं कमी है।
महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा मई 2010 में राजीव गांधी किशोरी सशक्तिकरण स्कीम (सबला) का प्रारंभ किया गया था। इस योजना के अन्तर्गत 11 वर्ष से लेकर 18 वर्ष तक की बेटियों को शारीरिक संरचना समझाने के साथ शरीर का विकास और स्वस्थ मां बनने में आने वाली अड़चनों को दूर रखने के गुर सिखाने का प्रावधान है। आंगनबाड़ी केद्रों पर इसके लिए शिक्षण, प्रशिक्षण के साथ स्वास्थ्य संबंधित जानकारियों व जांचों के साथ पुष्टाहार खिलाने की भी व्यवस्था की गई है। गंभीर बात यह है कि केंद्रों पर बालिकाएं जाकर डाकघर व बैंक से संबंधित सेवाओं के उपयोग के साथ ही अन्य सरकारी योजनाओं की जानकारी व शरीर विज्ञान की संरचना समझने में तो खूब रूचि दिखा रही हैं। लेकिन जब मामला एमाइलेज रिच एनर्जी 'पुष्टाहार' को खाने का आता है तो वह उसे जानवरों के हवाले कर देती हैं। कुछ इस तरह का हाल रक्त अल्पता से बचाने के लिए दी जाने वाली आयरन फोलिक एसिड की गोलियों का होता है।
अब सवाल उठता है कि जब बेटियां अपने बारे में जानने और मां बनने के पूर्व के सवालों को चाव से सुनती और समझती हैं तो फिर शरीर को स्वस्थ रखने वाले पुष्टाहार से परहेज क्यों कर रही हैं?
एमाइलेज रिच एनर्जी में पाए जाने वाले पोषक तत्व
गेंहू आटा, सोया आटा, मक्का, माल्टेड रागी, चीनी, घी, विटामिन मिनरल
सीडीपीओ रामेश्वर पाल कहते हैं कि वास्तव में इस तरह की शिकायतें कई गांवों से आई हैं। बेटियों की काउंसलिंग कर समस्या को दूर करने का प्रयास किया जा रहा है।

रविवार, 27 मार्च 2011

सृजन की नयी धारा का नाम है डफ की फाग

जागरण विशेष

- संरक्षण करने के प्रयास में लगे हैं लोग
चित्रकूट, संवाददाता: चित्रकूट की धरती स्रजन की धरती मानी जाती है और जब लोभ, मोह, माया, मत्सर, तृष्णा और तमाम सांसारिक वस्तुओं का त्याग चुके वीतरागी संतों के हाथ में फागुन के महीने में सुबह भगवान की आरती के बाद हाथ में ढपली आती है तो उनके मुंह से श्री राम-मां जानकी व श्री कृष्ण और राधा जी के होली में डूबे हुये गीत सुनाई देने लगते हैं। उमंग और उल्लास अपने आप जब छा जाता है तो उन्हें इस बात का जरा भी भान नही होता कि वे बैठे कहां हैं और क्या कर रहे हैं। इन दिनों धर्मनगरी के कई मंदिरों पर फगुवा गाने का दौर कुछ इसी अंदाज में चल रहा है।
धर्मनगरी की अपनी विलक्षणता के कारण यहां की स्थानीय भाषा में गाये जाने वाले फाग के रंग भी देश भर से अलग हैं। कामतानाथ पर्वत के उत्तरी दिशा में बसे गांव कामतन के रहने वाले संत राम भरोसे तिवारी उल्लसित होकर रघुनंदन खेलत होली ' को जब अपनी साधुक्कड़ी भाषा में गाते हैं तो शमा कुछ दूसरी ही हो जाती है। कामता गांव के ही कृष्ण गोपाल पयासी कहते हैं चित्रकूट की फाग में जो लचक है वह लचक और लोच दूसरी विधा में दिखाई नही देती। घेर कामता बने हैं दिवाला, चित्रकूट निज धाम हमको पियारौ लागै रामा धाम जैसे अनगिनत गीत जब उनके स्वरों में गूंजते हैं तो सुनने वाले अपने आप तालियां बजाने को मजबूर हो जाते हैं। गनेश प्रसाद पटेल ,डा. अशोक त्रिपाठी, ब्रज किशोर पांडेय, भूपेन्द्र पांडेय, श्याम द्विवेदी व बीरू द्विवेदी आदि जब ढपली, खडताल, ढोलक, झांझ और नगड़ियां में जब होली खेलत रघुवीरा गाते हैं तो वातावरण जीवंत हो उठता है।
बजरंग आश्रम के संत निर्भय दास बताते हैं कि चित्रकूट की डफ फाग वास्तव में विलुप्त होने के कगार पर है। हाल के वर्षो से इसे संरक्षित किये जाने का काम चल रहा है। पुराने और नये लोगों के सम्मिश्रण से अब आगे का लोगों को प्रेरित कर इस विधा को गाने के लिये प्रेरित किया जा रहा है।
लोक लय समारोह के कर्ताधर्ता समाजसेवी गोपाल भाई कहते हैं कि चित्रकूट की थाती है साधुक्कड़ी शैली में ढपली की सहायता से गाये जाने वाली फाग। इसको संरक्षित करने के लिये लोग अब आगे आने लगे हैं। लोकगीतों की कोई प्रचलित स्वरलिपि न होने के कारण तमाम विधायें गायब होने के कगार पर हैं। उन्हीं में एक यह भी है। इस बार होली के तुरन्त बाद होने वाले लोकलय में चित्रकूट की डफ फाग का विशेष प्रदर्शन होगा।



लोकगीत है फिल्मी गीत को हिट कराने का फार्मूला

चित्रकूट, संवाददाता: महंगाई डायन खाय जात है तो एक नमूना है .मुन्नी बदनाम हुई के साथ ही हिट हुये गानों की श्रंखला देखिये और फिर कहिये कि क्या यह पिट सकते हैं। अरे भइया लोक धुनें तो हमारी थाती हैं इन्हें सहेजकर ही कर्णप्रिय मैटेरियल बाहर आ सकता है। इसके लिये हमें गांवों में जाकर लोक कलाकारों की पहचान करनी पड़ेगी उनको संरक्षण देने के उपाय करने पड़ेगे। तब जाकर बुंदेली हो या फिर अन्य कोई लोक विधा तभी जाकर वास्तविक गरीबों को लाभ मिल पायेगा।

बातचीत में उरई से आईं लोक कला मर्मग्य की उपाधि से विभूषित बुंदेली संगीत में शोध करने वाली डाक्टर वीणा श्रीवास्तव इतनी मुखर हो उठी कि उन्होंने पंजाब, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र के संगीत से बुंदेली संगीत के पिछड़ने का कारण यहां के कलाकारों को मान लिया। उन्होंने वर्तमान व्यवस्था पर भी चोट करते हुये कहा कि लोक संगीत की थाती को सहेजकर रखने वाले अधिकतर लोग गांव से आते हैं। शहर में उन्हें पिछड़ा माना जाता है। अब कलाकार दो वक्त की रोटी के लिये जद्दोजहद करें या फिर अपने गले व हाथों से आपको मधुर स्वर लहरियां सुनायें। वैसे पिछले सात साल के सूखे ने तो यहां के लोगों के साथ ही संगीत की भी चूल्हें हिला कर रख दी वह तो भला हो आमिर खान का जिनके कानों में बुंदेली के अब मशहूर हो चुके गारी विधा के गीत 'सखि सईयां तो बहुतई कमात हैं मंहगाई डायन खाय जात है' को ओरिजनल कंपोजिशन में डालकर प्रस्तुत किया गया और बुंदेली संगीत को संजीवनी मिल गई।
अब यहां पर कलाकारों को संरक्षण देने के लिये सरकार के साथ ही सामाजिक संस्थाओं को आगे आना होगा जिससे कलाकारों के पेट रोटी के इंतजाम के साथ ही उचित प्रशिक्षण की व्यवस्था हो सके। लगातार सेमिनारों और प्रशिक्षण सत्रों से यहां के बुंदेली संगीत का भला हो सकेगा।



यहां पर स्थापित है नाथ संप्रदाय की पहली गादी

चित्रकूट, संवाददाता: 'हानि लाभ जीवन मरण यश अपयश विधि हाथ' भले ही यह लाइनें गोस्वामी तुलसीदास ने साढे़ पांच सौ साल पहले ही लिखी हों पर वास्तव में इन शब्दों के गूढ़ मायने चित्रकूट की धरती पर पांच हजार साल पहले ही व्यक्त किये जा चुके थे। कैलाश पर्वत पर भगवान शंकर से दीक्षा के लेने के बाद जब स्वामी मच्कि्षन्द्र नाथ को विश्व भ्रमण का आदेश मिला तो उनके कदम चित्रकूट पहुंचकर थम गये। यहां की प्राकृतिक सुषमा और विविधता से वह इतने प्रभावित हुये कि उन्होंने अपनी पहली गादी यहीं स्थापित कर दी। यहीं चित्रकूट में अनुसुइया के जंगलों पर उन्हें अपने सुयोग्य शिष्य के रूप में गोरखनाथ भी मिल गये। गादी की स्थापना करने के साथ गुरु गोरखनाथ को कैलाश ले जाकर अपनी दिव्य शक्तियां देने के बाद वे वहीं पंच तत्वों में विलीन हो गये। गुरु गोखरनाथ ने स्यामल नाथ को अपना शिष्य बनाया। उन्होंने भी गुप्त नाथ को अपना शिष्य बनाया। गुरु गुप्त नाथ के समय नाथ संप्रदाय के इस प्रथम तीर्थ का विस्तार काफी तेजी से हुआ। पूरे देश से यहां पर आने वाले ज्ञान पिपासु अपनी ज्ञान साधना को पूर्ण करते रहे वहीं उन्होंने यहां पर व्यंकटेश भगवान की मूर्तियों के विग्रहों की स्थापना कर भगवान बाला जी के मंदिर की स्थापना की। नाथ संप्रदाय की पहली गादी को चित्रकूट में होने की मान्यता यहां पर महाराज गुप्त नाथ के समय ही मिली। यह परंपरा परमहंस नाथ, ब्रह्ममनन्द नाथ, माधव नाथ से बढ़कर अब वर्तमान गुरु योगेश्यवरानंद मंगलनाथ तक आ पहुंची है।

नाथ संप्रदाय के प्रमुख आचार्य योगेश्यवरानंद मंगलनाथ जी महाराज कहते हैं कि नाथ संप्रदाय का मतलब किसी को डराना नही बल्कि सभी प्राणियों में सद्गुणों को विस्तारित करना है। हर व्यक्ति में भगवान का अंश है। उसे किसी का डर नही होना चाहिये। मनुष्य को हानि लाभ जीवन मरण यश और अपयश तो विधि के विधान के अनुरूप ही मिलता है पर साधना वास्तव में उसे सभी कष्टों में खड़ा रहने की कला सिखाती है। जीवन संग्राम में विजय पथ का रास्ता केवल साधना से ही संभव है। आदि नाथ भगवान शंकर के डमरू से निकला ओंकार आज भी उतना ही प्रभावी है जितना प्रभावी वह स्वामी मच्छिन्द्र नाथ जी के समय पर था। वे कहते हैं कि दर्शन ही सभी प्रकार के ज्ञान और विज्ञान की मां है। अगर दर्शन नही होता तो किसी प्रकार की वस्तुओं का जन्म ही नही होता। खुद को शांत रखने के लिये वे साधना करने पर बल देते हैं और थोड़ा समय अपने लिये निकाल लेने पर ऐसा करना संभव बताते हैं।

पेयजल समस्या से निपटने के लिये प्रशासन ने कसी कमर

सर्वाधिक गांव हैं मानिकपुर ब्लाक में

-पहाड़ी ब्लाक में हो सकती है इस बार ज्यादा दिक्कत
चित्रकूट, संवाददाता: अब तो प्यास को लेकर मारामारी की स्थिति पैदा होने ही वाली है। पानी की समस्या को लेकर ऐसे हालत बनते जा रहे हैं कि आने वाले दिन भयावह होने वाले हैं। वैसे सरकारी आंकड़ों में पेयजल समस्या के मामले में मानिकपुर ब्लाक को जहां सर्वाधिक संवेदनशील घोषित किया गया है वहीं मंदाकिनी के सूख जाने के बाद अब तो तो तिरहार क्षेत्र में इस बार दिक्कतें काफी बढ़ सकती हैं। वैसे दो दिन पहले ही मुख्यालय के समीपवर्ती गांव में हैंडपम्पों के जवाब देने के कारण जल निगम को पानी सप्लाई देने के लिये रात में टयूब बेल चलाये जाने के निर्देश खुद जिलाधिकारी ने दिये हैं। फिलहाल जल निगम ने प्यासों को पानी देने के लिये अभी से अपनी कमर कस ली है। पिछले सालों की तरह ही इस साल भी टैंकरों के सहारे प्यासों की प्यास को बुझाने का इंतजाम किया जायेगा। इस योजना में लगभग 69 लाख रुपयों के खर्च होने का स्टीमेट बनाया है।
जल निगम अस्थायी शाखा के परियोजना प्रबंधक डी के शुक्ला बताते हैं कि पानी को लेकर अभी से कार्य योजना बनाकर उसकी स्वीकृति विभागीय स्तर पर ले ली गई है। मानिकपुर ब्लाक के इटवां गांव से पानी की दिक्कत होने की पहली शिकायत आयी है। सर्वे के लिये अधिकारियों को भेजा गया है। अगर जरूरत होगी तो टैंकर से पानी की सप्लाई प्रारंभ कर दी जायेगी।
उन्होंने बताया कि खुटहा, रैपुरवा माफी, घुरेटनपुर, मानपुर यादव के डेरा में, रसिन मजरा -चक्कला, ब्यूर, छिवलहा, गौशाला, महोदव व रसिन गांव में हरिजन बस्ती, ग्राम पंचायत बैहार मजरा डोकहा पुरवा, भभई, महराजपुर, बकटा बुजुर्ग, इटौरा, कपना, पथरामानी, पहाड़ी कस्बा व कर्का पडरिया का मजरा वेटन का पुरवा व कोलहाई, उमरी का मजरा बगीचा का पुरवा, डांडी व कोलान, किहुनिया का मजरा पयासी पुरवा, ऊंचाडीह का मजरा गढ़वा, टेढुवा, झलमल, कोलान,गुलरियापुरवा, डोडामाफी का मजरा सोसायटी कोलान, गोपीपुर , ग्राम सेमरदहा, खांचा पुरवा, गदरहापुरवा, खैराहनपुरवा, कोटा कदैला का मजरा हडहाई पुरवा, चूल्ही, रामपुर कल्याणगढ़, ददरी माफी का मजरा छोटी बिलहरी, बराह माफी, सरहट मानिकपुर देहात, सकरौंहा, अमचुर नेरूआ, कोटा कदैला का मजरा कदैला पुरवा, सिंगवन पुरवा, रूकमा बुजुर्ग का मजरा खांचा पुरवा, टिकरिया मजरा जमुनिहाई, निही मजरा भाटा, सिमरधा बडौदा, मारकुंडी डांडी कोलान, महुलिया, टंकी पुरवा, भभरा पुरवा, खिरवा पुरवा, चमरवा पुरवा, इटवां, महुलिया व देवरा आदि गांवों को आने वाले समय में पेयजल किल्लत होने वाले संभावितों में शामिल कर लिया गया है। टैंकरों की व्यवस्था भी कर ली गई है। पीने के पानी की समस्या की जानकारी मिलने पर तुरन्त ही टैंकर भेज दिये जायेंगे।



अगले साल चित्रकूट में होगा श्री राम यज्ञ

चित्रकूट, संवाददाता: भगवान राम बाबा भोलेनाथ की पूजा करते हैं तो शंकर भी हर समय भगवान राम का ही जप करते हैं। आध्यात्म की इस बड़ी गुत्थी को सही सिद्ध करने का काम नाथ संप्रदाय के साधकों द्वारा चित्रकूट की धरती पर अगले साल किया जायेगा। योगाभ्यानंद मंगलनाथ महाराज ने अगले साल की चैत्र राम नवमी को बाला जी मंदिर में श्री राम यज्ञ किये जाने की घोषणा की। शनिवार को नाथ संप्रदाय के प्रमुख योगाभ्यानंद मंगलनाथ महाराज ने अपने शिष्यों को संदेश देते हुये कहा कि अब उनके जीवन के पचहत्तर बंसत बीत चुके हैं और भारतीय दर्शन की आश्रम व्यवस्था की डोर उन्हें सन्यास आश्रम में जाने के लिये कह रही है। इसलिये अब पूर्ण रूप से वे भगवा वस्त्र धारण कर सन्यासी के वेश में रहकर सभी को आत्म कल्याण के साथ ही पूरे विश्व के कल्याण के गुर सिखाते रहेंगे। इसके साथ ही उन्होंने वर्ष 2012 में चित्रकूट में नाथ संप्रदाय की पहली गादी पर चैत्र माह की राम नवमी को श्री राम यज्ञ करने की घोषणा की। इस दौरान टाउन हाल पर बाहर से आये स्थानीय हजारों भक्तों की मौजूदगी में नव नाथ यज्ञ की पूर्णाहुति हुई। इसके पूर्व मंगलनाथ महाराज ने भगवान भोले नाथ का रूद्राभिषेक करने के साथ ही नारायण स्त्रोत का पाठ किया।
इस दौरान व्यवस्था का गुरुतर भार उठाने में आनंद राव तैलंग, श्री रंग परस पारखी, नरेन्द्र केवले, अतुल पांडरीकर, मधुकर राव नायगांवकर, पद्माकर चोरधरे, कु. भालेन्द्र सिंह, श्री राम पांडेय, सुरेश राम हरि जोग, इन्द्र कुमार त्रिपाठी व गोबिंद पयासी आदि लोग शामिल रहे।

..तो नहीं बदल सकी अलंकृत उद्यान की दशा

चित्रकूट, संवाददाता: मंशा तो थी कि यहां पर लोग सुबह और शाम की ताजी हवा खाकर अपने आपको स्वस्थ रखे। कार्य योजना भी बनी। बड़ी-बड़ी बातें हुई और पत्थर लगाकर काम को शुरू करने का दावा भी किया गया पर शहर के बच्चे, बूढे और जवान इसका इंतजार ही करते रह गये कि कब यह योजना पूरी होगी और औषधियों से युक्त ताजी हवा में उन्हें टहलने का मौका मिलेगा। पिछले आठ सालों से जिलाधिकारी आवास के पीछे की जमीन पर अलंकृत उद्यान की योजना को पूरा किया जाने से ज्यादा टरकाने का काम ज्यादा दिखाई देता है। महत्वपूर्ण बात तो यह है कि यह एक ऐसा स्थान है जिसमें एक बार नही दो बार एक ही काम के लिये शुभारंभ जिलाधिकारियों ने किया पर उनके द्वारा तैयार करवाई गई कार्ययोजना अभी तक पूरी नही हो सकी।

पिछले आठ सालों में अलंकृत उद्यान को अलग-अलग तरह से दो बार उद्घाटन होने के बाद भी अभी यह पार्क डरावनी जगह के तौर पर ही जाना जाता है। गौरतलब है कि जिला बनने के बाद जिलाधिकारी जगन्नाथ सिंह ने सबसे पहले इस खाली पड़ी जमीन की चिंता व्यक्त की थी। उन्होने पहली बार उद्यान विभाग को लगभग एक हेक्टेयर का पूरा रकबा राजकीय उद्यान बनाने के लिये दिलवाया था। उनकी मंशा थी कि यहां पर न केवल अच्छे फल और फूलों वाले पौधों का उत्पादन किया जाये और इसे घूमने के पार्क के रूप में विकसित किया जाये।
वर्ष 2003 में तत्कालीन जिलाधिकारी राम सूरत दुबे ने यहां पर अलंकृत उद्यान की परिकल्पना कर 13 मई को इसका विधिवत शुभारंभ किया। उनकी कार्ययोजना में बच्चों के लिये पार्क जिसमें झूले लगे हों और बड़ों के टहलने के लिये पाथ वे तथा औषधीय पौधों की प्रचुरता वाले पार्क का निर्माण हो। बच्चों के मनोरंजन के लिये झूले और अन्य समान तो लगाये गये पर औषधियों से भरा बगीचा अलंकृत उद्यान नही बन सका। इसके बाद आये जिलाधिकारियों ने इसकी सुधि नही ली। इसके बाद वर्ष 2009 में पूर्व जिलाधिकारी हृदेश कुमार ने फिर से एक बार रूचि लेकर एक जुलाई को राजकीय अलंकृत उद्यान में बागवानी के शुभारंभ का काम कर दिया। जिला उद्यान अधिकारी धीरेन्द्र मिश्र ने बताया अलंकृत उद्यान में पिछले साल काफी पौधे लगवाये गये थे। अभी पौधों के बढ़ने में समय है। फिर भी उनकी देखरेख के लिये लोग लगे हैं जल्द ही पार्क का स्वरूप दिखाई देगा।




बुधवार, 23 मार्च 2011

पानी की कमी से जूझ रहे पाठा के कलाकार

चित्रकूट, संवाददाता : एक नही आश्चर्य करने के कई कारण फिर भी रहा वही रोना? तीर्थनगरी के प्रवेश द्वार रानीपुर भट्ट के अखिल भारतीय समाज सेवा संस्थान के भारत जननी परिसर में परिसर में चौथे लोकलय समारोह में आये पाठा के कलाकारों ने मंच पर गाते और थिरकते हुये भले ही उत्साह और उमंग से लबरेज रहे हों पर मंच से उतरने के बाद जब उनसे उनके इलाके में पीने के पानी की समस्या पर जागरण ने सवाल पूंछे तो उनका दर्द चेहरों पर साफ उभर आया।
मानिकपुर के पाठा क्षेत्र के गांव सरहट, गोपीपुर , करौंहा, टिकरिया, जमुनिहाई, छोटी व बड़ी पाटिन व मोटवन आदि गांवों से आये कलाकारों ने रूंधे गले से पानी की कमी की बात कही।
टिकरिया के रहने वाले राजाराम, आनंद, सुधा व संगीता ने कहा कि हैंडपम्पों ने साथ छोड़ना प्रारंभ कर दिया है। कुंये और तालाब तो पहले ही बरबाद हो चुके थे। अब तो केवल चोहड़ों का भरोसा है।
मारकुंडी की रहने वाली गीता, सुमन ने कहा कि अभी तो हैंडपम्पों में रूक-रूक कर पानी आ रहा है लेकिन जल्द ही यह जवाब दे जायेगे फिर तो तीन किलोमीटर दूर चोहडे से पानी भरना उनकी मजबूरी होगी।
उमेश, संजू, सुखराम, सुधा आदि ने तो इस बार की होली को पानी की कमी के कारण फीका बताते हुये कहा कि आने वाले दिनों में स्थिति क्या होगी क्योंकि अभी तो पूरी गर्मी ही पड़ी हुई है। उन्होंने कहा कि वे देहाती कलाकार हैं अगर सरकार वास्तव में उनका भला चाहती है तो अन्य योजनाओं के पहले पानी पिलाने की योजना पर काम करे जिससे कम से कम वे जिंदा तो रह सकें।

अभी तो जारी है इकतारे की यात्रा

चित्रकूट, संवाददाता: 'तन तंबूरा तार मन अद्भुत है यह साज, मन के हाथों बंध चला मन की है आवाज' भगवान श्री कृष्ण की भक्ति वाल्सल्य के रूप में करने वाले महाकवि सूरदास हों या फिर स्वामी हरिदास दोनों ने अपनी भक्ति का माध्यम इकतारे को ही बनाया। भक्ति कालीन परंपरा के साथ ही लोकगायकों को जब नादस्वरम के रूप में जब तंबूरे से स्वर मिले तो उनकी आवाजों का पैना पन बढ़ या। इतना ही नही सितार और गिटार का जनक इकतारे को भले ही आज बड़े संगीत कारों ने विलुप्ति की श्रेंणी में रख छोड़ा हो पर अभी भी बुंदेली विधाओं के गीत संगीत में तो इसका व्यापक प्रयोग दिखाई देता है। एक ही तार पर तबूरे के माध्यम से हवा में जो स्वर उत्पन्न होते हैं उन्हें नादस्वर मानने वाले कलाकार तो कहते हैं कि यह तो भगवान शंकर का प्रसाद है। क्योकि डमरू को पहला वाद्ययंत्र माना जाता है और उसमें भी डोरी तो कसी जाती है। इसकी सहायता से ही स्वर मिलता है। जो आवाज को स्थायित्व देने का काम करता है।

बांदा के बडोखर से आये कलाकार छोटे लाल व पर्वत लाल कहते कि इकतारे का प्रयोग तो पहले काफी फिल्मों में भी किया गया। आज भी कभी-कभी इसके सुरों का उपयोग दिखाई देता है। वैसे समय की मार के चलते सस्ता किंतु उपयोगी वाद्ययंत्र अब समाप्त होने की कगार पर है। इसको संरक्षण देने की आवश्यकता है।

गुरुवार, 23 दिसंबर 2010

जागने का दिन

                             संदीप रिछारिया
दीपावली के बाद पड़ने वाली एकादशी को ही देवोत्थान एकादशी कहते हैं। देव उठनी या प्रबोधिनी एकादशी भी इसे कहा जाता है। कहा जाता है कि इस दिन भगवान विष्णु चार मास की निद्रा त्याग कर इसी एकादशी को जागे थे।

भगवान विष्णु के इस जागरण से हमारे सामाजिक संदर्भों के तार भी जुड़ते हैं। क्योंकि भगवान विष्णु गृहस्थों के देवता माने जाते हैं। उन्हें संसार का पालन-पोषण करने वाला जाना जाता है। उन्हीं की एक इकाई एक आम गृहस्थ भी है, जो अपने परिवार का पालन-पोषण करता है। देवोत्थान एकादशी इसी बहाने गृहस्थों को संदेश देती है कि यदि अतीत में वे अपने कर्तव्यों के प्रति विमुख अथवा सुषुप्तावस्था में थे, तो अब वे जाग जाएं। अपने कर्तव्यों के प्रति जागरण ही देवउठनी या देवोत्थान एकादशी है।
इसके साथ ही सभी अच्छे कार्यों की शुरुआत हो जाती है। यह भी दायित्वों से जुड़े कार्य होते हैं। जबकि देवशयनी एकादशी पर भगवान का लंबी निद्रा में सोना यह नहीं संकेत करता कि लोग भी सो जाएं। कथा के अनुसार, भगवान विष्णु ने भगवती लक्ष्मी को अवकाश देने के लिए ऐसा किया था। इस प्रकरण से हमें गृहलक्ष्मी को सम्मान देने की भावना को बल मिलता है। लेकिन देवोत्थान एकादशी का संदर्भ यही संदेश देता है कि कर्तव्य हमारे लिए अधिक महत्वपूर्ण हैं।
देवोत्थान एकादशी को चित्रकूट में सास्कृतिक और आध्यात्मिक माहौल का सृजन होने लगता है। यहा दीपावली पर इतनी रौनक नहीं होती, जितनी देवोत्थान एकादशी पर। यहा इस दिन देव दीपावली महोत्सव भी आयोजित किया जाता है। देवों के जागरण के साथ ही प्रतिदिन मंदाकिनी नदी के किनारे वैदिक ऋचाओं के साथ ही हर-हर महादेव के समवेत स्वर गूंजने लगते हैं। स्वर्णिम आभा से परिपूर्ण सूर्य के दस्तक देने से पहले ही वे वातावरण को और भी ज्यादा मागलिक बना देते हैं। भोर का सूरज निकलने के पहले ही सूप के साथ थालियों और घटे घड़ियालों के स्वरों में उठो देव -उठो देव के स्वर भारतीय संस्कृति के उस रूप को परिलक्षित करते हैं, जिसमें हम जागरण का संदेश देते हैं। चार माह के विश्राम के बाद देव को नींद से उठाकर उनसे बुंदेली भाषा के सधे लोकसुरों में 'उठो देव उठो देव कुंवारेन कौ ब्याह करौ, ब्याहन कौ चलाऔ करौ, ब्याहन को पुत्र दो.. अपनी मनोकामनाओं की अभिव्यक्ति करते हैं।
मंदाकिनी में झिलमिल आभा..
चित्रकूट में देवोत्थान एकादशी के दिन शाम होते-होते मंदाकिनी के तट की छटा अपने आपमें निराली हो जाती है। दो प्रदेशों की सीमाओं में विभक्त चित्रकूट के घाटों पर चहल-पहल बढ़ जाती है। शाम को घाटों को सुंदर दीपकों से सजाने के साथ ही रंगोली और फूल-पत्तियों से अपना कला-कौशल दिखाने का मौका आता है, तो लोग उसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। दोनो तरफ के घाटों में सुंदर सजावट के बाद प्रतिदिन होने वाली गंगा आरतियों के साथ ही जब विभिन्न गायकों की स्वर लहरिया वाद्य यंत्रों की धुनों पर निकलती हैं, तो लगता है कि अध्यात्म के जरिए चित्रकूट की लोककला कितनी समृद्ध हो रही है।
कई दशक से मध्य प्रदेश क्षेत्र के नयागाव स्टेट में मंदाकिनी तट पर इस दिन देव दीपावली महोत्सव आयोजित करने वाले राज परिवार के चौबे राजा तेज भान सिंह व चौबे राजा हेमराज सिंह कहते हैं, 'चित्रकूट में दीपावली का पर्व वास्तव में इसी दिन देव दीपावली के रूप में मनाया जाता है। पुरखों ने यहा पर मंदाकिनी के किनारे हर आम और खास के लिये वषरें पहले देव दीपावली को ही दीपावली के स्वरूप में मनाना शुरू किया था। मंदाकिनी के घाटों को दीपकों व रंगोली से सजाने के साथ ही यहा सुप्रसिद्ध लोक गायकों की गायकी का आनंद लोग उठाते हैं। इस दिन चित्रकूट में देश भर से लोग यहा के उत्सव में शामिल होने आते हैं और यहा की समृद्ध लोक-संस्कृति की प्रशसा करते हैं।




शनिवार, 11 सितंबर 2010

हर जगह होती रही नानाजी के कार्यो की चर्चा

चित्रकूट। ग्रामोदय विश्वविद्यालय में शुक्रवार को हर जगह युगऋषि नानाजी ही चर्चाओं के केंद्र में रहे। चाहे भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी हों या मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, इन वीआईपी की सुरक्षा में लगे पुलिस कर्मी हों या फिर ग्रामोदय विश्वविद्यालय के छात्र सभी नानाजी को याद कर नतमस्तक हो रहे थे।
मौका था युगऋषि समाजसेवी नानाजी देशमुख के षट्मासिक श्राद्ध का। कृतज्ञ ग्रामोदय विश्वविद्यालय परिवार ने शुक्रवार को अपने संस्थापक कुलाधिपति नानाजी देशमुख के षट्मासिक श्राद्ध का आयोजन किया। इस आयोजन में चित्रकूट के समीपवर्ती क्षेत्रों के हजारों लोगों के साथ विभिन्न राज्यों से आये भाजपा के नेताओं ने भी हिस्सा लिया। सुबह से शुरू हुये यज्ञ में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. कृष्णबिहारी पांडेय ने पत्नी विनोदनी पांडेय के साथ हवन कुंड में आहुतियां दीं। इस दौरान भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, मदनदास देवी, श्रीकृष्ण महेश्वरी, माखन सिंह, शंकर प्रसाद ताम्रकार, भाजपा के उत्तर प्रदेश संगठन महामंत्री नागेन्द्रनाथ त्रिपाठी समेत विभिन्न प्रांतों से आये भाजपा के संगठन मंत्रियों ने ग्रामोदय विश्वविद्यालय में पहुंचकर नानाजी को श्रद्घासुमन अर्पित किये।
कार्यक्रम के दौरान ग्रामोदय विश्वविद्यालय के छात्र, शिक्षकों के साथ ही आयोजन में आये सभी लोग की जुबां पर बस नानाजी के कार्यो की चर्चा थी। धर्मनगरी से सटे पालदेव गांव से आये बुजुर्ग नारायण ने कहा कि नानाजी तो इस क्षेत्र के लिये भगवान की तरह थे। उन्होंने दस्युओं का गढ़ रहे इस क्षेत्र में शिक्षा, विकास व सामाजिक समरसता की गंगा बहा कर जीवन का नजरिया बदल दिया। विश्वविद्यालय के अध्ययनरत छात्र विनीत द्विवेदी ने कहा कि नानाजी अब हमारे बीच नहीं हैं किंतु चित्रकूट क्षेत्र में हुये कार्य सदैव नानाजी की याद दिलाते रहेंगे।

बैठक में नहीं फटक सके स्थानीय भाजपाई

चित्रकूट। भाजपा संगठन मंत्रियों के तीन दिवसीय के राष्ट्रीय अभ्यास वर्ग में पहले दिन ही स्थानीय नेताओं का प्रवेश वर्जित कर दिया गया। वो तो भला हो ग्रामोदय विश्वविद्यालय का जिसने नानाजी के षट्मासिक श्राद्ध कार्यक्रम को सार्वजनिक कर दिया वरना स्थानीय भाजपाइयों को अपने बडे़ नेताओं के दर्शन भी न मिलते।
चित्रकूट के उद्यमिता विद्यापीठ में शुक्रवार को भाजपा के देश भर से आये संगठन मंत्रियों का तीन दिवसीय अभ्यास वर्ग शुरू हो गया। बैठक में पार्टी के बडे़ नेताओं के आगमन को लेकर स्थानीय भाजपाइयों ने भी तैयारी कर रखी थी किंतु आयोजन स्थल के द्वार पर ऐसी सख्ती हुई कि भाजपाइयों के पार्टी नेताओं से मिलने के अरमान धरे रह गये। उद्यमिता विद्यापीठ में तैनात सुरक्षाकर्मियों के अलावा प्रवेश द्वार पर लगे पार्टी के पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं ने पहले ही दिन साफ कर दिया कि बैठक में किसी सूरत में भाग लेने के लिये आमंत्रित किये गये संगठन मंत्री के अलावा कोई नेता नहीं जायेगा। इसके बावजूद स्थानीय भाजपाइयों ने प्रवेश द्वार से घुसने के लिये पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं की काफी मान मनौव्वल भी की किंतु अंत में मायूसी ही हाथ लगी।
ऐसे में आमजनों के बीच हो रही फजीहत से परेशान भाजपाइयों के लिये ग्रामोदय विश्वविद्यालय में आयोजित श्राद्ध कार्यक्रम राहत का सबब बन गया। इस कार्यक्रम को विश्वविद्यालय परिवार ने सार्वजनिक तौर पर समाजसेवी नानाजी देशमुख की याद में आयोजित किया था। जिसमें क्षेत्र के हजारों लोगों को आमंत्रित भी किया गया था। उद्यमिता विद्यापीठ में प्रवेश से वंचित होने बाद मायूस भाजपाई मजबूरी में ग्रामोदय विश्वविद्यालय के कार्यक्रम में पहुंचे। इसके बाद भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी व मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के कार्यक्रमों में पहुंचने पर स्थानीय भाजपाई भी बड़े नेताओं के इर्द गिर्द मंडराते रहे।
हालांकि भाजपा के कुछ नेता धर्मनगरी में बडे़ नेताओं के आगमन पर स्वागत द्वार व होडिरर््ग्स लगवाने के साथ ही उद्यमिता विद्यापीठ के सामने तक पहुंच गये। मप्र की जमीन पर उत्तर प्रदेश के नेताओं के होर्डिग्स चर्चा के विषय भी रहे। होर्डिग्स के सहारे अपना चेहरा दिखाकर अभ्यास वर्ग में अंदर पहुंच पाने की जुगत भी नेताओं की कामयाब नहीं हो पाई।

राजनीति और समाजसुधार एक ही सिक्के के दो पहलू : मदन दास

चित्रकूट। 'पूर्ण कालिक अवधारणा की भूमिका' विषय पर बोलते हुये राष्ट्रीय प्रचारक प्रमुख मदनदास देवी ने देश भर से आये संगठन मंत्रियों को संदेश दिया कि सेवा का व्रत कठिन है। राजनीति और समाज सुधार एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। नानाजी ने अपना जीवन एक ऋषि की तरह जिया। पूर्णकालिक कार्यकर्ता के रूप में उनसे अच्छा उदाहरणात्मक व्यक्तित्व दिखाई नही देता। राजनीति में तो उदाहरण बने ही समाजसेवा के क्षेत्र में भी उन्होंने समाज की दिशा और दशा दोनों को बदलने का काम किया।
उद्यमिता विद्यापीठ के डा. राम मनोहर लोहिया सभागार में शुक्रवार को प्रारंभ हुये संगठन सचिवों के अभ्यास वर्ग का पहला पाठ सुबह 11 बजे से 12.30 तक मदनदास देवी ने ही पढ़ाया। यही सत्र परिचयात्मक सत्र भी बना जिसमें भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी व मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उनके विचार सुने। भोजन और चाय के बाद दूसरा सत्र भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने लिया। इसका विषय देश की वर्तमान स्थिति और भाजपा रहा। डेढ़ घंटे के इस सत्र में उन्होंने सभी संगठन मंत्रियों से दिल खोलकर बात की। उन्होंने बताया कि एक कार्यकर्ता का आचरण कैसा होना चाहिये। इस समय संगठन की स्थिति कैसी है इसमें सुधार करने की जरुरत कहां-कहां पर है। राम मंदिर विवाद या फिर बिहार और उत्तर प्रदेश के चुनाव सभी पर उन्होंने अपने विचार काफी गंभीरता के साथ व्यक्त किये। इस दौरान उन्होंने गुजरात मुद्दे के साथ ही उत्तर प्रदेश में होने वाले पंचायत चुनावों के बारे में भी चर्चा कर संगठन सचिवों को कमर कस कर तैयार हो जाने का आवाहन किया। शाम पांच बजे से साढ़े छह बजे तक तीन सत्र चले। इन सत्रों में प्रशिक्षण विषय पर रामप्यारे पांडेय, अन्त्योदय विषय पर, मोर्चा और प्रकोष्ठों से संबंधित जानकारी मनोहर लाल ने दी। शाम के सत्र में साढ़े सात बजे से मदनदास देवी ने एक बार फिर 'परिवार संकल्पना व समन्वय अनुभव और कठिनाइयां' विचार बांटे। उन्होंने कहा कि पार्टी के अंदर काम करने वाले सभी एक परिवार की तरह होते हैं। इसलिये सभी के आचार विचार और व्यवहार भी ऐसे ही होने चाहिये। इस दौरान नानाजी देशमुख के जीवन दर्शन को दिखाता एक फोल्डर व दीनदयाल शोध संस्थान की पत्रिका नवरचना की प्रतियां भी सभी को बांटी गई।

गडकरी ने पढ़ाया पार्टी के मूल सिद्धांतों का पाठ

चित्रकूट। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने शुक्रवार को यहां देश भर से आये संगठन मंत्रियों को पार्टी के मूल सिद्धांतों का पाठ लगभग डेढ़ घंटे पढ़ाया। इस दौरान उन्होंने अयोध्या मामले के साथ ही कश्मीर में धारा 370 को हटाये जाने के मामलों पर भी चिंतन प्रस्तुत किया।
उद्यमिता विद्यापीठ के डा. राममनोहर लोहिया सभागार में पार्टी कार्यकर्ताओं को मुख्य रूप से संदेश देने के उनके विषय बिहार व उत्तर प्रदेश के आगामी चुनाव रहे। उन्होंने कहा कि वास्तव में देश में भाजपा की स्थिति को मजबूत करने के लिये कौन से कारक व मुद्दे अच्छे हो सकते हैं इसके लिये सभी को चिंतन करना है। कहा कि उप्र के कार्यकर्ताओं के सामने अग्निपरीक्षा का समय है। ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत सदस्य व जिला पंचायत सदस्यों को अधिक से अधिक संख्या में जिताने के प्रयास होने चाहिये।
लगभग डेढ़ घंटे तक चले उद्बोधन में देश की वर्तमान स्थिति के बारे में भी उन्होंने चर्चा की। कहा कि महंगाई सुरसा की तरह बढ़ रही है इसको रोकने के केंद्र के सभी उपाय व्यर्थ हैं। इसके पूर्व आरोग्य धाम परिसर पर हेलीपैड पर पत्रकारों से उन्होंने बात करने से इंकार करते हुये कहा कि वे यहां संगठन मंत्रियों के अभ्यास वर्ग में आये हैं। यहां राजनीति पर कोई भी बात करना उचित नही होगा।
नानाजी देशमुख के षट्मासिक श्राद्ध कार्यक्रम में महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय के प्रौद्योगिकी भवन पहुंचकर नानाजी व श्रीराम दरबार के चित्र पर पुष्प अर्पित करने के बाद उन्होंने कहा कि यहां नानाजी के श्राद्ध कार्यक्रम में आये हैं। इसलिये यहां भी राजनीतिक चर्चा नहीं होनी चाहिये। उन्होंने नानाजी को युगऋषि बताते हुये कहा कि राजनीतिक जीवन में रहते हुये भी वे एक ऋषि का जीवन व्यतीत करते थे। आज भले ही वे नही हैं पर वे चित्रकूट के लोगों के साथ ही अन्य सभी के दिलों में जिंदा हैं। उनके साथ ही आये मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि राष्ट्रीय अध्यक्ष के होते हुये उनका बोलना ठीक नहीं है। अभ्यास वर्ग के परिचयात्मक सत्र के बाद वे ग्रामोदय विश्वविद्यालय में नानाजी के षट्मासिक श्राद्ध कार्यक्रम में भी सम्मिलित हुये। उनके साथ सतना से सांसद गणेश सिंह भी आये थे। हेलीपैड पर राष्ट्रीय अध्यक्ष का स्वागत चित्रकूट मप्र विधायक सुरेन्द्र सिंह गहरवार ने किया।

अभ्यास वर्ग: कुंद होती धार को तेज करने का प्रयास

चित्रकूट। पार्टी का गिरता जनाधार और हाथों से निकलते राज्यों के साथ महंगाई के मुद्दे पर विफलता के बाद अब भारतीय जनता पार्टी ने अपने तरकश में चित्रकूट में बैठकर वे तीर निकालने की रणनीति बनाई है जिनकी धार वास्तव में कुंद हो चुकी है। राष्ट्रीयस्तर पर पार्टी की क्षमता को बढ़ाने के लिये रणनीति के प्रमुख हिस्से संगठन मंत्रियों को भी नये जमाने की हाईटेक हवा लग चुकी है। भाजपा के तरकश के ये तीर अब उतने कारगर रुप से लक्ष्य को नहीं भेद पा रहे जितनी आशा उनसे संगठन करता है। इसीलिये उप्र, राजस्थान, दिल्ली जैसे राज्य पार्टी के हाथों से निकल गये।
वैसे केंद्र की सत्ता तक पहुंचने में जहां राममंदिर के साथ ही अटल विहारी बाजपेई, लालकृष्ण आडवानी व मुरलीमनोहर जोशी की छवि ने काम किया था वहीं उस समय संघ, विहिप के साथ ही भाजपा के सभी संगठन मंत्री तेजी से लगे थे पर अब समय बदल चुका है। सत्ता का स्वाद चखकर जहां नेताओं के दिन बहुर चुके हैं वहीं कभी कार्यकर्ताओं के घर से रोटी खाने और पार्टी के कार्यालयों में रात्रि में रुकने वाले संगठनमंत्री महंगी गाडि़यों में घूमते नजर आते हैं। चित्रकूट में अभ्यास वर्ग में पहुंचने से पूर्व तो उत्तर प्रदेश के कुछ संगठन मंत्री यहीं के लाजों में विश्राम कर उद्यमिता विद्यापीठ प्रांगण में पहुंचे थे। उधर, परिचयात्मक सत्र के बाद जब मीडिया से बात करने के लिये सतना के पार्टी जिलाध्यक्ष व अभ्यास वर्ग में सर्वव्यवस्था प्रमुख का दायित्व संभाल रहे सुरेन्द्र सिंह बघेल से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि क्या किया जाये। जब सत्ता मिलने के बाद कार्यकर्ता भी थोड़ा बहुत आराम तलब हो जाते हैं तो संगठन मंत्री क्यों न ऐसे हो जायें। वैसे इस अभ्यास सत्र का मुख्य उद्देश्य भी इन्हीं संगठन मंत्रियों को एक बार फिर से सोद्देश्य बनाने के लिये तेजी से काम पर लगाना है।

वाल्मीकि ने दशरथ नंदन को किया राम के रूप में स्थापित

चित्रकूट। 'उल्टा राम जपति जग जाना, वाल्मीकि भये ब्रह्म समाना' श्री राम चरित के अमर गायक गोस्वामी तुलसीदास जी ने जिन महर्षि वाल्मीकि को श्री राम के गुणगान करने के कारण ब्रह्म की श्रेणी में रख दिया था वास्तव में श्री राम के प्रति उनके विचार कुछ अलग थे। इस बात का पुख्ता सबूत महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित 'मूल रामायणम्' में साफ मिलता है कि उन्होंने श्री राम को परमात्मा नही बल्कि मर्यादा की प्रतिमूर्ति पुरुषोत्तम दशरथ नंदन को ही माना है और शायद चित्रकूट में युग ऋषि नाना जी देशमुख की प्रेरणा से बना राम दर्शन इसी बात की अनुभूति कराता है। जहां पर श्री राम को विश्व का पहले समाजसुधारक के रुप में चरितार्थ किया गया है।
महर्षि वाल्मीकि के जन्म स्थान को लेकर चाहे जितने विवाद विद्वानों के बीच हों पर यहां के विद्वान सिर्फ एक कारण के साथ ही पूरे विवादों की इति श्री कर देते हैं।
जगद्गुरु रामभद्राचार्य विकलांग विश्वविद्यालय में संस्कृत विभाग के अधिष्ठाता प्रो. योगेश चंद्र दुबे कहते हैं कि मूल रामायण हो या फिर रामायणम् या फिर बाबा तुलसीकृत श्री राम चरित मानस तीनों में ही चित्रकूट के साथ ही यहां के अन्य प्राकृतिक सुषमा से युक्त स्थानों का विशद वर्णन जितने स्पष्ट तौर पर प्रमाणिकता के साथ किया गया है। उतना किसी और भाषा की या लेखक की रामायण में नही मिलता। इसलिये यह विवाद व्यर्थ का है वे कहां पर रहे हैं। वैसे इस प्रमाणिकता को पूरा विश्व स्वीकार कर चुका है कि श्री राम के चरित्र का पहला प्रक्षेपण महर्षि वाल्मीकि ने ही किया था।
उन्होंने कहा कि मूल रामायण के प्रथम चरण में ही जब देवर्षि नारद से महर्षि वाल्मीकि प्रश्न करते हैं कि पूरी सृष्टि में कौन सा ऐसा पुरुष है जिसका चरित्र और कर्तव्य निष्कलंक है तो उनका जवाब दशरथ नंदन श्री राम ही होता है।
कहा कि श्री राम जी का चरित्र ही एक ऐसा चरित्र है जो अन्य देव पुरुषों से उन्हें अलग करता है। पुरुषोत्तम की संज्ञा केवल उन्हें इसलिये दी गई है कि सोलह कलायें केवल श्री राम में है। श्री कृष्ण और अन्य देव पुरुषों में यह पूरी कलायें नही पाई गई।

जल्द ही मिलेगी मंदाकिनी को सीवर से मुक्ति

चित्रकूट। अगर सब कुछ सही चला तो मां मंदाकिनी को आने वाले साल के पहले महीने में सीतापुर कस्बे के सीवर से मुक्ति मिल जायेगी। जल निगम के अधिकारी दशकों पुरानी इस योजना को पूरा करने का काम कर रहे हैं। परियोजना प्रबंधक तो साफ तौर पर कहते हैं कि आगामी जनवरी के पहले हफ्ते में उनकी योजना नगर विकास मंत्री को चित्रकूट लाकर इस योजना का लोकार्पण करवाने की है।
गौरतलब है कि मंदाकिनी प्रदूषण को लेकर जागरण के जल संरक्षण अभियान के बाद जब उप्र की सरकार चेती। सबसे पहले उसे मंदाकिनी में गिरने वाले विशालकाय नाले से निजात दिलाने के लिये वर्षो पुरानी बंद पड़ी चित्रकूट सीवरेज योजना के लिये धन आवंटित कराने के प्रयास तेज किये। इस साल के मई महीने में प्रारंभ हुये 366.84 लाख रुपयों के काम अब अंतिम चरण में चलते दिखाई दे रहे हैं। इस योजना में जहां जमीन के अंदर 4153 मीटर पाइपों में 4100 मीटर पाइप डाला जा चुका है। सम्पवेल का काम भी 60 प्रतिशत पूरा हो चुका है। 75 गुणा 150 मीटर के दो आक्सीडेशन पांड को बनाने का काम भी सत्तर प्रतिशत पूरा हो चुका है। जनरेटर रुम को बनाने का काम बरसात की वजह से रोका गया है वैसे बरसात के पहले इसका लगभग तीस प्रतिशत काम पूरा हो चुका है।
जल निगम अस्थायी निर्माण खंड के परियोजना प्रबंधक आर.बी.लाल बताते हैं कि सम्पवेल का 60 प्रतिशत आक्सीडेशन पांड का काम 70 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है। सीवर लाइन तो पूरी बिछ चुकी है। केवल ज्वाइंटस को कसा जाना है। 1400 मीटर की राइजिंग मेन भी पूरी पड़ चुकी है। नवम्बर-दिसम्बर तक काम पूरा कर दिया जायेगा। जनवरी के पहले सप्ताह में नगर विकास मंत्री को चित्रकूट लाकर चित्रकूट सीवरेज योजना का शुभारंभ करवाने की इच्छा है।
उन्होंने बताया कि विभाग को यह योजना वर्ष 1996 में मिली थी। कभी पैसे की कमी आडे़ आई तो कभी स्थानीय परिस्थितियों ने साथ नही दिया। मई में काम को प्रारंभ किया गया था। बरसात के तुरन्त बाद काम समाप्त करने की स्थिति होगी।

मानवीय गुणों को दर्शाता महामानव का आचरण

चित्रकूट। प्राकृतिक सुषमा में रची बसी तपोस्थली पर त्रेतायुग में महर्षि वाल्मीकि ने एक ऐसा महाकाव्य रच दिया, जिसने एक साधारण मानव अयोध्या नरेश दशरथ के पुत्र राम को मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के रूप में प्रतिस्थापित कर दिया। आज भी इस भूमि की धूल को साधारण न समझकर रामरज कहा जाता है और उसका वंदन कर पापों के नष्ट होने जैसी मान्यता विद्यमान है। सोलह कलाओं से युक्त जिस महामानव की कल्पना का यथार्थ महर्षि वाल्मीकि ने इस धरती पर देखा था, उसको साकार रूप देने का काम युग ऋषि नानाजी देशमुख की इच्छा पर यहां राम दर्शन के रूप में फलीभूत हुआ। सेठ मंगतूराम जयपुरिया के पुत्र डॉ. राजाराम जयपुरिया के आर्थिक सहयोग से जब नानाजी की कल्पना ने उड़ान भरी तो पांच मंदिरों का समूह कुछ ऐसे रूप में सामने आया कि मानो परब्रह्म पूर्णतम् परमेश्वर का रूप यहां पर पुरुषोत्तम, समाजसुधारक और समाज को नयी दिशा देने के साथ नये युग की शुरूआत करनेवाले श्रीराम नजर आने लगे।
महर्षि वाल्मीकि और बाबा तुलसीदास जी के लिखे रामचरित से नाना जी ने वह प्रसंग और दृश्य निकाले जो श्रीराम को महामानव व युग उद्धारक के रूप में सीधे तौर पर परिभाषित करते हैं। पहले मंदिर में जहां विश्व में रामलीला आयोजित किये जानेवाले देशों के साथ ही वहां के निमंत्रण पत्र व मुखौटों के साथ ही अन्य विवरण मिलते हैं। यहां यह देख कर आश्चर्य होता है कि चीन और सोवियत रूस जैसे कम्युनिस्ट शासन वाले देशों में भी श्रीरामचरित का विस्तार इतने मार्मिक तरीके से किया जा रहा है। कोरिया के राजकुमार का विवाह अयोध्या की राजकुमारी के साथ का दुर्लभ चित्र भी यहां मौजूद है। इसके साथ ही रूस, जापान, वर्मा, कनाड़ा, लाओस, वियतनाम, फ्रांस, इंडोनेशिया, थाईलैंड, म्यांमार आदि देशों की भाषाओं में लिखी रामायणों के साथ ही वहां पर आयोजित होने वाली रामलीलाओं के दृश्यों को संयोजित किया गया है।
दूसरे मंदिर की शुरुआत श्रीराम के शिक्षा व अध्ययन से होती है। यहां पर शिक्षा का उद्देश्य स्पष्ट करते हुए बताया गया है कि विश्वविद्यालय से उपाधियां पाकर या आजीविका की क्षमता अर्जित कर स्वयं को शिक्षित मानना अपने आपको धोखा देना है। मुनि विश्वामित्र द्वारा यज्ञ की रक्षा के लिए श्रीराम लक्ष्मण को मांगना, अहल्या का पुर्नमिलन, राक्षसी ताड़का का वध, उच्च पदाधिकारी बहुलाश्व को प्राणदंड, पीडि़त युवतियों को समाज में उचित स्थान दिलाना, विनयशीलता की कुशलता से परशुराम का क्रोध शांत करना, मां की आज्ञा से भाई को राजपाट देकर खुद चौदह वर्ष के लिए वन में प्रस्थान, ऊंच-नीच का भेद मिटाकर निषादराज को गले लगाने के साथ ही भीलनी शबरी के हाथों से बेर खाना, चित्रकूट में मुनि वशिष्ठ और मां अनुसूइया से मिलन, भरत के चित्रकूट आने पर उन्हें स्नेह तो दिया पर राज्याभिषेक से इंकार कर वापस उन्हें अयोध्या भेजना, दानवी प्रकृति वाले राक्षसराज रावण से वानर और भालुओं के सहयोग से विजय प्राप्त करने जैसे दृश्य काफी मार्मिक हैं।
..और भी काफी खास है राम दर्शन
नव गृह के साथ ही सत्ताइस नक्षत्रों के पेड़ों के साथ ही रामदर्शन मंदिर समूह की विशेषता है कि यहां की किसी भी मूर्ति की न तो पूजा होती है और न ही कहीं प्रसाद या अगरबत्ती इत्यादि लगाने का प्रावधान है। मंदिर के मुख्य प्रवेशद्वार पर विनयवत श्री राम व जानकी को अपने हृदय में धारण करनेवाले बजरंगबली की विशालकाय प्रतिमा के दर्शन होते हैं तो आगे बढ़ने पर रामचरित के प्रथम प्रणेता महर्षि वाल्मीकि और गोस्वामी तुलसीदास जी की विशाल प्रतिमाएँ दिखायी देती हैं।
दीनदयाल शोध संस्थान के प्रधान सचिव डॉ. भरत पाठक कहते हैं कि नानाजी देशमुख श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के रूप में ही पूजा करते थे। वे कहा करते थे कि श्रीराम विश्व के पहले समाजसुधारक थे। रामदर्शन का निर्माण भी इसी भावना के साथ किया गया था कि यहां आने वाले लोग श्रीराम के मानवीय गुणों को देखें और परखें और उसी अनुसार आचरण करें, जिससे वे भी भावी जीवन मंगलमय तरीके से बिता सकें।

चित्रकूट: जहां आकर मूर्ति ध्वंसक औरंगजेब का हुआ था दर्प चूर

चित्रकूट।संदीप रिछारिया  कभी मुगलिया सल्तनत को विस्तार देने के उद्देश्य से देश भर के मंदिरों और मूर्तियों को तोड़कर हिंदू संस्कृति पर कुठाराघात करने वाले सम्राट औरंगजेब की जिंदगी का एक अध्याय ऐसा यहां जीती जागती अवस्था में मौजूद है जो उनकी विपरीत छवि को पेश करता है। देश में हिंदू मूर्तियों को तोड़ने वाले इस सम्राट ने चित्रकूट में न केवल एक विशाल मंदिर बनवाया बल्कि मंदिर की सम्पूर्ण व्यवस्था के लिये कर मुक्त आठ गांवों की जमीन दी व रोजाना की पूजा, भोग की व्यवस्था के लिये एक रुपया भी देना मुकर्रर किया। लेकिन आज इस विशाल मंदिर की हालत यह है कि इसे अपनों ने ही बरबाद कर दिया । पहले मंदिर के एक पूर्व महंत की नशे की लत ने गांवों की जमीनों को बरबाद कर दिया और विशाल मंदिर के बड़े भाग पर अतिक्रमणकारियों के कब्जे को लेकर जब विवाद बढ़ा तो इस पर जिला प्रशासन ने अपना रिसीवर नियुक्त कर दिया। इन सब के बावजूद आज भी देश के सम्राट के नतमस्तक होने की कहानी कहता यह अपनी गौरवगाथा दोहरा रहा है। यह मंदिर चित्रकूट में पवित्र मंदाकिनी के किनारे बना बाला जी का मंदिर है। जो निर्वाणी संत बाबा बालक दास जी महाराज को मुगलिया सल्तनत के जहांपनाह औरंगजेब द्वारा बनवाकर दिया गया था।
मंदिर के महंत राम नरेश दास बताते हैं कि 1683 ई. में सम्राट औरंगजेब चित्रकूट आया और उसने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि यहां के सब मंदिरों और मूर्तियों को तोड़ दिया जाये। रात होने के कारण यह काम सुबह से प्रारंभ किया जाना था। तभी अचानक रात में सभी सैनिकों के साथ खुद सम्राट के पेट में तेज दर्द प्रारंभ हो गया। इस दर्द से निजात पाने का उपाय उनके साथ आये हकीम नही कर सके। आसपास के लोगों ने उन्हें बताया कि चित्रकूट विलक्षण चमत्कारी संतों की भूमि है पास ही बाबा बालक दास जी रहते हैं उनसे बात करें तो शायद कुछ हो जाये। जहांपनाह खुद ही पैदल चल कर बाबा बालक दास की धूनी में पहुंचे। कातर दृष्टि से क्षमा याचना करने के बाद अपना कष्ट बताया। बाबा ने अपनी धूनी से उन्हें भभूती देकर कहा कि इसे खुद खाओ और सभी सैनिकों को भी खिलाओ। चमत्कारिक रुप से सभी का पेट दर्द सही हो गया। बाबा की चमत्कारिक सिद्धि से प्रभावित होकर औरंगजेब ने जब बाबा से कुछ मांगने को कहा तो बाबा नाराज हो उठे और उन्होंने चिमटा लेकर बादशाह को दौड़ा लिया। बाद में औरंगजेब की काफी आरजू मिन्नत करने पर उन्होंने कहा कि तुम पूरे देश में हिंदू मूर्तियों व मंदिरों का अपमान करते रहे हो यहां पर मंदिर बनवाओ और उसमें खुद ही मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा करो और इसके बाद तुम कभी किसी मूर्ति को तोड़ने का आदेश मत देना। बाबा की बात मानकर उसने न केवल यहां पर विशाल मंदिर बनवाया बल्कि मंदिर की व्यवस्था को सुचारु रुप से चलाने के लिये ठाकुर जी के सम्मान में 8 गांव देवखरी, हिनौता, चित्रकूट, रौदार, सिरिया, पड़री, जखा, दोहरिया दान में दिये। इसके साथ ही 330 बीघा बिना लगानी खेती काबिल जमीन राठ परगना के जोरा खांड गांव की 150 बीघा व अमरावती गांव की 180 बीघा जमीन भी दी। इसके साथ ही कोनी परोठा परगना के लगान से एक रुपया रोज भोग के लिये देना मुकर्रर किया।
वैसे सम्राट औरंगजेब ने बाबा के प्रति पूरा सम्मान दिखाते हुये इसे एक फरमान के द्वारा अपने शासनकाल के पैंतीसवें वर्ष मुकद्दस रमजान माह की 19 वीं तारीख को लेखक नवाब रफीउक कादर सहादत खां से तांब्र पत्र में लिपिबद्ध करवाकर मंदिर को सौंपा और उसमें इस बात का भी जिक्र किया कि आने वाली पीढि़यों में भी इस तरह की सहायता जारी रहेगी। आलमगीर का फरमान चित्रकूट के अधिपति पन्ना नरेश हिंदूपन्त ने भी इस बात का अक्षरश: पालन किया। अंग्रेजों ने भी उसे ज्यों का त्यों बरकरार रखा। आजादी के बाद जमींदारी उन्मूलन हो जाने के बाद भी इन गांवों का कुछ प्रतिकर मंदिर को मिलता रहा और मंदिर के वारिस आठ गांवों पर खेती करवाकर उपज लेते रहे। लगभग तीस साल पहले मंदिर के वैभव पर ग्रहण लगना प्रारंभ हुआ। मंदिर के एक महंत ने तो अपनी नशे की लत पूरी करने के लिये खेती पर ध्यान देने के बजाय जमीन को ही बेंचना प्रारंभ कर दिया। मंदिर परिसर पर बने कमरों में भी तमाम लोगों ने कब्जा करना प्रारंभ कर दिया। धीरे-धीरे सोलह बीघे के विशाल मंदिर परिसर पर केवल गर्भगृह पर ही पुजारियों का कब्जा रह सका। लगातार स्थिति बिगड़ती देखकर जिला प्रशासन ने इसे अपने आधिपत्य में ले लिया। तहसीलदार को इसका रिसीवर बना दिया गया।
अखिल भारतीय समाजसेवा संस्थान के संस्थापक गोपाल भाई कहते हैं कि आज देश में सांप्रदायिक सद्भाव की भावना की बेहद जरुरत है और इस तरह की बेशकीमती मिशाल बरबाद हो रही है। सरकारी संरक्षण के नाम पर भी इसे कुछ प्राप्त नही हो रहा है।
पुरातत्व विभाग के मंडल अधिकारी रणजीत सिंह कहते हैं कि उनको औरंगजेब के बनवाये बाला जी मंदिर की जानकारी हुई थी। इसके लिये लिखा पढ़ी की गई है, पर मामला अदालत में होने के कारण अभी यह मंदिर उनके विभाग को नही मिला है।
महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग के प्राध्यापक डा. कमलेश थापक कहते हैं कि चित्रकूट में ही आकर औरंगजेब को वास्तव में हिंदू ऋषियों के महत्व का ज्ञान हुआ था। उसने यहां पर बाबा बालकदास का चमत्कार देखकर न केवल मंदिर बनवाया बल्कि जागीरें भी दी। इस स्थान का विकास तो सरकार की जिम्मेदारी होना चाहिये।
एक दर्द यह भी
मंदिर के महंत रामनरेश दास बताते हैं कि विवादों के कारण सरकारी हस्तक्षेप हुआ। मंदिर के गर्भगृह को छोड़कर कुछ कमरों में रिसीवर ने न केवल तालाबंद कर दिया बल्कि मंदिर की सबसे कीमती धरोहर सम्राट औंरगजेब द्वारा दिया गया शाही फरमान भी सरकारी अधिकारी उठा ले गये। यह शाही फरमान तांबे पर उत्कीणित कर बनाया गया था। तब से आज तक कोई भी सरकारी अधिकारी यह बताने को तैयार नही की यह फरमान है कहां। उन्होंने आशंका जताई कि शायद यह फरमान सरकारी अधिकारियों ने गायब कर दिया है। इसलिये मंदिर में आने वालों को कागज पर फोटो कापी कराये हुये फरमान को ही दिखाया जाता है।
कहते हैं अधिकारी
मंदिर के रिसीवर बताये जाने वाले तहसीलदार अश्विनी कुमार श्रीवास्तव ने कहा कि अब वहां का रिसीवर तहसीलदार नही है। बल्कि पूर्व एडीएम ने एक समिति बनाकर उसको मंदिर की देखभाल की पूरी जिम्मेदारी दे दी थी। तब से समिति का अध्यक्ष प्रधान और उसके सदस्य ही जारौमाफी की जमीन का गल्ला ले रहे हैं। फरमान को लाये जाने के बावत उन्होंने कहा कि यह उनके पहले का मामला है इसलिये इस बात की उन्हें जानकारी नही है।