अपने पिता दरबारी लाल पटेल के साथ व भाई के साथ रवि नंदन

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शनिवार, 26 सितंबर 2026

डांडिया उत्सव, 22 अक्टूबर को सजेगा रंगारंग आयोजन

 आई नवरात्रि की बेला


चित्रकूट। शहर में डांडिया प्रेमियों के लिए एक बार फिर उत्सव और उल्लास का माहौल बनने जा रहा है। डांडिया उत्सव इस वर्ष अपने 4 थे वर्ष में प्रवेश कर रहा है। मुख्य आयोजक श्रीमती वैदेही खरे के नेतृत्व में 22 अक्टूबर को Vridan Van Garden में रंगारंग डांडिया कार्यक्रम का आयोजन किया जाएगा।

मुख्य आयोजक श्रीमती वैदेही खरे ने बताया कि पिछले 4 वर्षों से लगातार डांडिया आयोजन के माध्यम से लोगों को मनोरंजन के साथ भारतीय संस्कृति और पारंपरिक लोकनृत्य से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि डांडिया केवल नृत्य का आयोजन नहीं, बल्कि परिवार, मित्रों और समाज के लोगों के साथ मिलकर खुशियां बांटने और अपनी सांस्कृतिक परंपराओं को जीवंत रखने का अवसर है।

उन्होंने कहा, “4 थे वर्ष में प्रवेश कर रहे इस आयोजन को लेकर हम सभी बेहद उत्साहित हैं। हमारा प्रयास है कि इस बार का डांडिया उत्सव पहले से अधिक यादगार और उल्लासपूर्ण बने। शहरवासियों का लगातार मिल रहा स्नेह और सहयोग ही हमारी सबसे बड़ी प्रेरणा है।”

शहरवासियों से अपील

श्रीमती वैदेही खरे ने शहरवासियों से अपील करते हुए कहा कि परिवार और मित्रों के साथ अधिक से अधिक संख्या में कार्यक्रम में शामिल हों और डांडिया की रंग-बिरंगी शाम का आनंद लें। उन्होंने युवाओं से विशेष रूप से भारतीय संस्कृति और पारंपरिक नृत्य से जुड़ने का आह्वान किया।

आयोजकों के अनुसार कार्यक्रम में प्रवेश पास की व्यवस्था की गई है। पास शुल्क ₹600 रखा गया है। कार्यक्रम से संबंधित जानकारी एवं पास के लिए 9936361292 पर संपर्क किया जा सकता है।

मातृशक्ति के सम्मान से ही सशक्त समाज का निर्माण : डॉ. रामनारायण त्रिपाठी

 चित्रकूट में 27 सितंबर को ‘नारी उत्कर्ष समारोह’, गायत्री शक्तिपीठ के मुखिया डॉ. रामनारायण त्रिपाठी ने किया सहभागिता का आह्वान

चित्रकूट।

नारी केवल परिवार की धुरी नहीं, बल्कि संस्कार, सृजन और समाज निर्माण की मूल शक्ति है। जिस समाज में मातृशक्ति का सम्मान होता है, वहां संस्कारों की जड़ें मजबूत होती हैं और आने वाली पीढ़ियां बेहतर दिशा प्राप्त करती हैं। इसी भाव को जन-जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से चित्रकूट में ‘नारी उत्कर्ष समारोह’ का आयोजन किया जा रहा है।

गायत्री परिवार चित्रकूट एवं गायत्री शक्तिपीठ चित्रकूटधाम के संयोजन में यह विशेष समारोह 27 सितंबर, रविवार को दोपहर 1 बजे से शाम 4:30 बजे तक गायत्री शक्तिपीठ चित्रकूट में आयोजित होगा।

गायत्री शक्तिपीठ चित्रकूट के मुखिया डॉ. रामनारायण त्रिपाठी ने मातृशक्ति और समाज के सभी वर्गों से इस आयोजन में सहभागी बनने की अपील की है। उनका कहना है कि नारी सम्मान केवल शब्दों या मंचों तक सीमित रहने वाला विषय नहीं, बल्कि परिवार और समाज के व्यवहार में दिखाई देने वाला संस्कार होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि मां बच्चे की पहली गुरु है और बालक के चरित्र एवं प्रतिभा की नींव मां की गोद से ही पड़ती है। इसलिए मातृशक्ति के सम्मान, शिक्षा, जागरण और सशक्तिकरण को सामाजिक अभियान का स्वरूप देना समय की आवश्यकता है।

डॉ. त्रिपाठी ने अपील करते हुए कहा कि मां, बेटी, बहन और प्रत्येक नारी के प्रति सम्मान तथा सेवा भाव को जीवन का हिस्सा बनाया जाए। परिवार मजबूत होगा तो समाज मजबूत होगा और मजबूत समाज ही सशक्त राष्ट्र का निर्माण कर सकता है।

नारी उत्कर्ष के पांच प्रमुख संदेश

समारोह में परिवार, समाज और राष्ट्र निर्माण में मातृशक्ति के योगदान को विशेष रूप से रेखांकित किया जाएगा। साथ ही—

  • परिवार, समाज और राष्ट्र निर्माण में मातृशक्ति की भूमिका
  • मां को सृजन की शक्ति के रूप में सम्मान
  • बालकों के चरित्र एवं प्रतिभा निर्माण में मां की भूमिका
  • मातृशक्ति के सम्मान, शिक्षा, जागरण एवं सशक्तिकरण का संदेश
  • मां, बेटी, बहन और नारी के प्रति सम्मान एवं सेवा भाव

जैसे विषयों पर जनजागरण किया जाएगा।

चित्रकूट की धरती से उठेगा नारी सम्मान का स्वर

चित्रकूट जैसी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक भूमि पर होने वाला यह आयोजन केवल एक समारोह नहीं, बल्कि परिवार और समाज में नारी के प्रति सम्मान की चेतना को मजबूत करने का प्रयास है।

आयोजकों ने अधिक से अधिक लोगों से समारोह में पहुंचकर मातृशक्ति के सम्मान और नारी उत्कर्ष के इस अभियान में सहभागी बनने की अपील की है।

स्थान: गायत्री शक्तिपीठ, चित्रकूट
दिनांक: 27 सितंबर 2026, रविवार
समय: दोपहर 1 बजे से शाम 4:30 बजे तक
आयोजक: गायत्री परिवार चित्रकूट एवं गायत्री शक्तिपीठ चित्रकूटधाम

डॉ. रामनारायण त्रिपाठी की अपील का सार:
“नारी का सम्मान केवल आयोजन का विषय न बने, वह हमारे संस्कार और व्यवहार का हिस्सा बने—यही सच्चा नारी उत्कर्ष है।”

शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

पैरों की लयात्मकता में बरसा संगीत

महोबा, स्टाफ रिपोर्टर : विलक्षण. अद्भुत की आवाजों के साथ ही तालियों की गड़गड़ाहट .. जी हां, खजुराहो के चंदेली मंदिर समूह के ओपन सभागार में जैसे ही घुंघरूओं से बंधे पैरों की लयात्मकता बढ़ी वैसे ही उपस्थित लोगों के हाथों से तालियों की गूंज सुनाई देने लगी। उमा सत्यनारायण की वरिष्ठ शिष्या माने जाने वाली अन्वेषा दास के द्वारा भरतनाट्यम नृत्य के दौरान 'अरंगेत्रम' के दौरान तो लोग मंत्र मुग्ध हो गए, ऐसा लगा कि सैकड़ों लोग सांस रोककर नृत्य का आनंद ले रहे हैं।




ओडिसा की रहने वाली चेन्नई में पली बढ़ी अन्वेषा दास के नृत्य की विशेषता उनका भाव प्रवण अभिनय था। इसके पश्चात ओडिसी के सुविख्यात गुरु केलु चरण महापात्र, कुमकुम मोहन्ती, मायाधर राउत के शिष्य पूर्णा श्री राउत व लकी मोहंती ने जब युगल नृत्य प्रस्तुत किया तो उसमें उड़िया छाप साफ दिखाई दी। नृत्य में भगवान जगन्नाथ की आराधना साफ झलकी। मुद्राओं और चितवन के साथ पैरों की थिरकन बिलकुल तबले की थापें गिनी जा सकती थी। इस बीच बलभद्र और सुभद्रा का संवाद भी काफी सराहा गया। डा. वेंकट वेम्पति व वेम्पति रवि शंकर का कुचिपुड़ी नृत्य न केवल आकर्षक मुद्राओं के लिए दर्शनीय बना बल्कि उनका जोश और पथ संचलन दर्शकों की तालियों का कारण बना। खजुराहो नृत्य उत्सव की अंतिम प्रस्तुति के दौरान दर्शकों का उत्साह इतना बढ़ा कि वह लोग खड़े होकर देर तक तालियां बजाते रहे। स्थानीय दर्शकों के अलावा फ्रांस, जर्मनी, चेकोस्लाविया, नामीबिया, ब्राजील के अलावा तमाम देशों के दर्शक मौजूद रहे।

मंगलवार, 22 जनवरी 2013

जब भैसों को खिलाएं पंजीरी तो कैसे बनें बेटियां 'सबला'

संदीप रिछारिया, महोबा: बेटियां युवती से महिला बनने की प्रक्रिया की बारीकियां तो सीखने में रुचि दिखा रही हैं, पर शरीर को स्वस्थ रखने का माध्यम 'पुष्टाहार' भैंस-गायों के हवाले कर रही हैं। यह नजारा केवल एक गांव का नहीं बल्कि हर गांव व गली में ऐसे दृश्य आम हैं। सबला को परवान चढ़ाने में लगे अधिकारी भी इस बात से भौचक हैं कि 'एमाइलेज रिच एनर्जी' का दुरुपयोग आखिर हो क्यों रहा है? अधिकारी कहते हैं कि शायद योजना के प्रसार प्रचार या कार्यकत्रियों के समझाने में कहीं न कहीं कमी है।
महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा मई 2010 में राजीव गांधी किशोरी सशक्तिकरण स्कीम (सबला) का प्रारंभ किया गया था। इस योजना के अन्तर्गत 11 वर्ष से लेकर 18 वर्ष तक की बेटियों को शारीरिक संरचना समझाने के साथ शरीर का विकास और स्वस्थ मां बनने में आने वाली अड़चनों को दूर रखने के गुर सिखाने का प्रावधान है। आंगनबाड़ी केद्रों पर इसके लिए शिक्षण, प्रशिक्षण के साथ स्वास्थ्य संबंधित जानकारियों व जांचों के साथ पुष्टाहार खिलाने की भी व्यवस्था की गई है। गंभीर बात यह है कि केंद्रों पर बालिकाएं जाकर डाकघर व बैंक से संबंधित सेवाओं के उपयोग के साथ ही अन्य सरकारी योजनाओं की जानकारी व शरीर विज्ञान की संरचना समझने में तो खूब रूचि दिखा रही हैं। लेकिन जब मामला एमाइलेज रिच एनर्जी 'पुष्टाहार' को खाने का आता है तो वह उसे जानवरों के हवाले कर देती हैं। कुछ इस तरह का हाल रक्त अल्पता से बचाने के लिए दी जाने वाली आयरन फोलिक एसिड की गोलियों का होता है।
अब सवाल उठता है कि जब बेटियां अपने बारे में जानने और मां बनने के पूर्व के सवालों को चाव से सुनती और समझती हैं तो फिर शरीर को स्वस्थ रखने वाले पुष्टाहार से परहेज क्यों कर रही हैं?
एमाइलेज रिच एनर्जी में पाए जाने वाले पोषक तत्व
गेंहू आटा, सोया आटा, मक्का, माल्टेड रागी, चीनी, घी, विटामिन मिनरल
सीडीपीओ रामेश्वर पाल कहते हैं कि वास्तव में इस तरह की शिकायतें कई गांवों से आई हैं। बेटियों की काउंसलिंग कर समस्या को दूर करने का प्रयास किया जा रहा है।

रविवार, 27 मार्च 2011

सृजन की नयी धारा का नाम है डफ की फाग

जागरण विशेष

- संरक्षण करने के प्रयास में लगे हैं लोग
चित्रकूट, संवाददाता: चित्रकूट की धरती स्रजन की धरती मानी जाती है और जब लोभ, मोह, माया, मत्सर, तृष्णा और तमाम सांसारिक वस्तुओं का त्याग चुके वीतरागी संतों के हाथ में फागुन के महीने में सुबह भगवान की आरती के बाद हाथ में ढपली आती है तो उनके मुंह से श्री राम-मां जानकी व श्री कृष्ण और राधा जी के होली में डूबे हुये गीत सुनाई देने लगते हैं। उमंग और उल्लास अपने आप जब छा जाता है तो उन्हें इस बात का जरा भी भान नही होता कि वे बैठे कहां हैं और क्या कर रहे हैं। इन दिनों धर्मनगरी के कई मंदिरों पर फगुवा गाने का दौर कुछ इसी अंदाज में चल रहा है।
धर्मनगरी की अपनी विलक्षणता के कारण यहां की स्थानीय भाषा में गाये जाने वाले फाग के रंग भी देश भर से अलग हैं। कामतानाथ पर्वत के उत्तरी दिशा में बसे गांव कामतन के रहने वाले संत राम भरोसे तिवारी उल्लसित होकर रघुनंदन खेलत होली ' को जब अपनी साधुक्कड़ी भाषा में गाते हैं तो शमा कुछ दूसरी ही हो जाती है। कामता गांव के ही कृष्ण गोपाल पयासी कहते हैं चित्रकूट की फाग में जो लचक है वह लचक और लोच दूसरी विधा में दिखाई नही देती। घेर कामता बने हैं दिवाला, चित्रकूट निज धाम हमको पियारौ लागै रामा धाम जैसे अनगिनत गीत जब उनके स्वरों में गूंजते हैं तो सुनने वाले अपने आप तालियां बजाने को मजबूर हो जाते हैं। गनेश प्रसाद पटेल ,डा. अशोक त्रिपाठी, ब्रज किशोर पांडेय, भूपेन्द्र पांडेय, श्याम द्विवेदी व बीरू द्विवेदी आदि जब ढपली, खडताल, ढोलक, झांझ और नगड़ियां में जब होली खेलत रघुवीरा गाते हैं तो वातावरण जीवंत हो उठता है।
बजरंग आश्रम के संत निर्भय दास बताते हैं कि चित्रकूट की डफ फाग वास्तव में विलुप्त होने के कगार पर है। हाल के वर्षो से इसे संरक्षित किये जाने का काम चल रहा है। पुराने और नये लोगों के सम्मिश्रण से अब आगे का लोगों को प्रेरित कर इस विधा को गाने के लिये प्रेरित किया जा रहा है।
लोक लय समारोह के कर्ताधर्ता समाजसेवी गोपाल भाई कहते हैं कि चित्रकूट की थाती है साधुक्कड़ी शैली में ढपली की सहायता से गाये जाने वाली फाग। इसको संरक्षित करने के लिये लोग अब आगे आने लगे हैं। लोकगीतों की कोई प्रचलित स्वरलिपि न होने के कारण तमाम विधायें गायब होने के कगार पर हैं। उन्हीं में एक यह भी है। इस बार होली के तुरन्त बाद होने वाले लोकलय में चित्रकूट की डफ फाग का विशेष प्रदर्शन होगा।



लोकगीत है फिल्मी गीत को हिट कराने का फार्मूला

चित्रकूट, संवाददाता: महंगाई डायन खाय जात है तो एक नमूना है .मुन्नी बदनाम हुई के साथ ही हिट हुये गानों की श्रंखला देखिये और फिर कहिये कि क्या यह पिट सकते हैं। अरे भइया लोक धुनें तो हमारी थाती हैं इन्हें सहेजकर ही कर्णप्रिय मैटेरियल बाहर आ सकता है। इसके लिये हमें गांवों में जाकर लोक कलाकारों की पहचान करनी पड़ेगी उनको संरक्षण देने के उपाय करने पड़ेगे। तब जाकर बुंदेली हो या फिर अन्य कोई लोक विधा तभी जाकर वास्तविक गरीबों को लाभ मिल पायेगा।

बातचीत में उरई से आईं लोक कला मर्मग्य की उपाधि से विभूषित बुंदेली संगीत में शोध करने वाली डाक्टर वीणा श्रीवास्तव इतनी मुखर हो उठी कि उन्होंने पंजाब, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र के संगीत से बुंदेली संगीत के पिछड़ने का कारण यहां के कलाकारों को मान लिया। उन्होंने वर्तमान व्यवस्था पर भी चोट करते हुये कहा कि लोक संगीत की थाती को सहेजकर रखने वाले अधिकतर लोग गांव से आते हैं। शहर में उन्हें पिछड़ा माना जाता है। अब कलाकार दो वक्त की रोटी के लिये जद्दोजहद करें या फिर अपने गले व हाथों से आपको मधुर स्वर लहरियां सुनायें। वैसे पिछले सात साल के सूखे ने तो यहां के लोगों के साथ ही संगीत की भी चूल्हें हिला कर रख दी वह तो भला हो आमिर खान का जिनके कानों में बुंदेली के अब मशहूर हो चुके गारी विधा के गीत 'सखि सईयां तो बहुतई कमात हैं मंहगाई डायन खाय जात है' को ओरिजनल कंपोजिशन में डालकर प्रस्तुत किया गया और बुंदेली संगीत को संजीवनी मिल गई।
अब यहां पर कलाकारों को संरक्षण देने के लिये सरकार के साथ ही सामाजिक संस्थाओं को आगे आना होगा जिससे कलाकारों के पेट रोटी के इंतजाम के साथ ही उचित प्रशिक्षण की व्यवस्था हो सके। लगातार सेमिनारों और प्रशिक्षण सत्रों से यहां के बुंदेली संगीत का भला हो सकेगा।



यहां पर स्थापित है नाथ संप्रदाय की पहली गादी

चित्रकूट, संवाददाता: 'हानि लाभ जीवन मरण यश अपयश विधि हाथ' भले ही यह लाइनें गोस्वामी तुलसीदास ने साढे़ पांच सौ साल पहले ही लिखी हों पर वास्तव में इन शब्दों के गूढ़ मायने चित्रकूट की धरती पर पांच हजार साल पहले ही व्यक्त किये जा चुके थे। कैलाश पर्वत पर भगवान शंकर से दीक्षा के लेने के बाद जब स्वामी मच्कि्षन्द्र नाथ को विश्व भ्रमण का आदेश मिला तो उनके कदम चित्रकूट पहुंचकर थम गये। यहां की प्राकृतिक सुषमा और विविधता से वह इतने प्रभावित हुये कि उन्होंने अपनी पहली गादी यहीं स्थापित कर दी। यहीं चित्रकूट में अनुसुइया के जंगलों पर उन्हें अपने सुयोग्य शिष्य के रूप में गोरखनाथ भी मिल गये। गादी की स्थापना करने के साथ गुरु गोरखनाथ को कैलाश ले जाकर अपनी दिव्य शक्तियां देने के बाद वे वहीं पंच तत्वों में विलीन हो गये। गुरु गोखरनाथ ने स्यामल नाथ को अपना शिष्य बनाया। उन्होंने भी गुप्त नाथ को अपना शिष्य बनाया। गुरु गुप्त नाथ के समय नाथ संप्रदाय के इस प्रथम तीर्थ का विस्तार काफी तेजी से हुआ। पूरे देश से यहां पर आने वाले ज्ञान पिपासु अपनी ज्ञान साधना को पूर्ण करते रहे वहीं उन्होंने यहां पर व्यंकटेश भगवान की मूर्तियों के विग्रहों की स्थापना कर भगवान बाला जी के मंदिर की स्थापना की। नाथ संप्रदाय की पहली गादी को चित्रकूट में होने की मान्यता यहां पर महाराज गुप्त नाथ के समय ही मिली। यह परंपरा परमहंस नाथ, ब्रह्ममनन्द नाथ, माधव नाथ से बढ़कर अब वर्तमान गुरु योगेश्यवरानंद मंगलनाथ तक आ पहुंची है।

नाथ संप्रदाय के प्रमुख आचार्य योगेश्यवरानंद मंगलनाथ जी महाराज कहते हैं कि नाथ संप्रदाय का मतलब किसी को डराना नही बल्कि सभी प्राणियों में सद्गुणों को विस्तारित करना है। हर व्यक्ति में भगवान का अंश है। उसे किसी का डर नही होना चाहिये। मनुष्य को हानि लाभ जीवन मरण यश और अपयश तो विधि के विधान के अनुरूप ही मिलता है पर साधना वास्तव में उसे सभी कष्टों में खड़ा रहने की कला सिखाती है। जीवन संग्राम में विजय पथ का रास्ता केवल साधना से ही संभव है। आदि नाथ भगवान शंकर के डमरू से निकला ओंकार आज भी उतना ही प्रभावी है जितना प्रभावी वह स्वामी मच्छिन्द्र नाथ जी के समय पर था। वे कहते हैं कि दर्शन ही सभी प्रकार के ज्ञान और विज्ञान की मां है। अगर दर्शन नही होता तो किसी प्रकार की वस्तुओं का जन्म ही नही होता। खुद को शांत रखने के लिये वे साधना करने पर बल देते हैं और थोड़ा समय अपने लिये निकाल लेने पर ऐसा करना संभव बताते हैं।