अपने पिता दरबारी लाल पटेल के साथ व भाई के साथ रवि नंदन

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मंगलवार, 22 जनवरी 2013

जब भैसों को खिलाएं पंजीरी तो कैसे बनें बेटियां 'सबला'

संदीप रिछारिया, महोबा: बेटियां युवती से महिला बनने की प्रक्रिया की बारीकियां तो सीखने में रुचि दिखा रही हैं, पर शरीर को स्वस्थ रखने का माध्यम 'पुष्टाहार' भैंस-गायों के हवाले कर रही हैं। यह नजारा केवल एक गांव का नहीं बल्कि हर गांव व गली में ऐसे दृश्य आम हैं। सबला को परवान चढ़ाने में लगे अधिकारी भी इस बात से भौचक हैं कि 'एमाइलेज रिच एनर्जी' का दुरुपयोग आखिर हो क्यों रहा है? अधिकारी कहते हैं कि शायद योजना के प्रसार प्रचार या कार्यकत्रियों के समझाने में कहीं न कहीं कमी है।
महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा मई 2010 में राजीव गांधी किशोरी सशक्तिकरण स्कीम (सबला) का प्रारंभ किया गया था। इस योजना के अन्तर्गत 11 वर्ष से लेकर 18 वर्ष तक की बेटियों को शारीरिक संरचना समझाने के साथ शरीर का विकास और स्वस्थ मां बनने में आने वाली अड़चनों को दूर रखने के गुर सिखाने का प्रावधान है। आंगनबाड़ी केद्रों पर इसके लिए शिक्षण, प्रशिक्षण के साथ स्वास्थ्य संबंधित जानकारियों व जांचों के साथ पुष्टाहार खिलाने की भी व्यवस्था की गई है। गंभीर बात यह है कि केंद्रों पर बालिकाएं जाकर डाकघर व बैंक से संबंधित सेवाओं के उपयोग के साथ ही अन्य सरकारी योजनाओं की जानकारी व शरीर विज्ञान की संरचना समझने में तो खूब रूचि दिखा रही हैं। लेकिन जब मामला एमाइलेज रिच एनर्जी 'पुष्टाहार' को खाने का आता है तो वह उसे जानवरों के हवाले कर देती हैं। कुछ इस तरह का हाल रक्त अल्पता से बचाने के लिए दी जाने वाली आयरन फोलिक एसिड की गोलियों का होता है।
अब सवाल उठता है कि जब बेटियां अपने बारे में जानने और मां बनने के पूर्व के सवालों को चाव से सुनती और समझती हैं तो फिर शरीर को स्वस्थ रखने वाले पुष्टाहार से परहेज क्यों कर रही हैं?
एमाइलेज रिच एनर्जी में पाए जाने वाले पोषक तत्व
गेंहू आटा, सोया आटा, मक्का, माल्टेड रागी, चीनी, घी, विटामिन मिनरल
सीडीपीओ रामेश्वर पाल कहते हैं कि वास्तव में इस तरह की शिकायतें कई गांवों से आई हैं। बेटियों की काउंसलिंग कर समस्या को दूर करने का प्रयास किया जा रहा है।

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