अपने पिता दरबारी लाल पटेल के साथ व भाई के साथ रवि नंदन

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बुधवार, 23 मार्च 2011

अभी तो जारी है इकतारे की यात्रा

चित्रकूट, संवाददाता: 'तन तंबूरा तार मन अद्भुत है यह साज, मन के हाथों बंध चला मन की है आवाज' भगवान श्री कृष्ण की भक्ति वाल्सल्य के रूप में करने वाले महाकवि सूरदास हों या फिर स्वामी हरिदास दोनों ने अपनी भक्ति का माध्यम इकतारे को ही बनाया। भक्ति कालीन परंपरा के साथ ही लोकगायकों को जब नादस्वरम के रूप में जब तंबूरे से स्वर मिले तो उनकी आवाजों का पैना पन बढ़ या। इतना ही नही सितार और गिटार का जनक इकतारे को भले ही आज बड़े संगीत कारों ने विलुप्ति की श्रेंणी में रख छोड़ा हो पर अभी भी बुंदेली विधाओं के गीत संगीत में तो इसका व्यापक प्रयोग दिखाई देता है। एक ही तार पर तबूरे के माध्यम से हवा में जो स्वर उत्पन्न होते हैं उन्हें नादस्वर मानने वाले कलाकार तो कहते हैं कि यह तो भगवान शंकर का प्रसाद है। क्योकि डमरू को पहला वाद्ययंत्र माना जाता है और उसमें भी डोरी तो कसी जाती है। इसकी सहायता से ही स्वर मिलता है। जो आवाज को स्थायित्व देने का काम करता है।

बांदा के बडोखर से आये कलाकार छोटे लाल व पर्वत लाल कहते कि इकतारे का प्रयोग तो पहले काफी फिल्मों में भी किया गया। आज भी कभी-कभी इसके सुरों का उपयोग दिखाई देता है। वैसे समय की मार के चलते सस्ता किंतु उपयोगी वाद्ययंत्र अब समाप्त होने की कगार पर है। इसको संरक्षण देने की आवश्यकता है।

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