संदीप रिछारिया
दीपावली के बाद पड़ने वाली एकादशी को ही देवोत्थान एकादशी कहते हैं। देव उठनी या प्रबोधिनी एकादशी भी इसे कहा जाता है। कहा जाता है कि इस दिन भगवान विष्णु चार मास की निद्रा त्याग कर इसी एकादशी को जागे थे।
भगवान विष्णु के इस जागरण से हमारे सामाजिक संदर्भों के तार भी जुड़ते हैं। क्योंकि भगवान विष्णु गृहस्थों के देवता माने जाते हैं। उन्हें संसार का पालन-पोषण करने वाला जाना जाता है। उन्हीं की एक इकाई एक आम गृहस्थ भी है, जो अपने परिवार का पालन-पोषण करता है। देवोत्थान एकादशी इसी बहाने गृहस्थों को संदेश देती है कि यदि अतीत में वे अपने कर्तव्यों के प्रति विमुख अथवा सुषुप्तावस्था में थे, तो अब वे जाग जाएं। अपने कर्तव्यों के प्रति जागरण ही देवउठनी या देवोत्थान एकादशी है।
इसके साथ ही सभी अच्छे कार्यों की शुरुआत हो जाती है। यह भी दायित्वों से जुड़े कार्य होते हैं। जबकि देवशयनी एकादशी पर भगवान का लंबी निद्रा में सोना यह नहीं संकेत करता कि लोग भी सो जाएं। कथा के अनुसार, भगवान विष्णु ने भगवती लक्ष्मी को अवकाश देने के लिए ऐसा किया था। इस प्रकरण से हमें गृहलक्ष्मी को सम्मान देने की भावना को बल मिलता है। लेकिन देवोत्थान एकादशी का संदर्भ यही संदेश देता है कि कर्तव्य हमारे लिए अधिक महत्वपूर्ण हैं।
देवोत्थान एकादशी को चित्रकूट में सास्कृतिक और आध्यात्मिक माहौल का सृजन होने लगता है। यहा दीपावली पर इतनी रौनक नहीं होती, जितनी देवोत्थान एकादशी पर। यहा इस दिन देव दीपावली महोत्सव भी आयोजित किया जाता है। देवों के जागरण के साथ ही प्रतिदिन मंदाकिनी नदी के किनारे वैदिक ऋचाओं के साथ ही हर-हर महादेव के समवेत स्वर गूंजने लगते हैं। स्वर्णिम आभा से परिपूर्ण सूर्य के दस्तक देने से पहले ही वे वातावरण को और भी ज्यादा मागलिक बना देते हैं। भोर का सूरज निकलने के पहले ही सूप के साथ थालियों और घटे घड़ियालों के स्वरों में उठो देव -उठो देव के स्वर भारतीय संस्कृति के उस रूप को परिलक्षित करते हैं, जिसमें हम जागरण का संदेश देते हैं। चार माह के विश्राम के बाद देव को नींद से उठाकर उनसे बुंदेली भाषा के सधे लोकसुरों में 'उठो देव उठो देव कुंवारेन कौ ब्याह करौ, ब्याहन कौ चलाऔ करौ, ब्याहन को पुत्र दो.. अपनी मनोकामनाओं की अभिव्यक्ति करते हैं।
मंदाकिनी में झिलमिल आभा..
चित्रकूट में देवोत्थान एकादशी के दिन शाम होते-होते मंदाकिनी के तट की छटा अपने आपमें निराली हो जाती है। दो प्रदेशों की सीमाओं में विभक्त चित्रकूट के घाटों पर चहल-पहल बढ़ जाती है। शाम को घाटों को सुंदर दीपकों से सजाने के साथ ही रंगोली और फूल-पत्तियों से अपना कला-कौशल दिखाने का मौका आता है, तो लोग उसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। दोनो तरफ के घाटों में सुंदर सजावट के बाद प्रतिदिन होने वाली गंगा आरतियों के साथ ही जब विभिन्न गायकों की स्वर लहरिया वाद्य यंत्रों की धुनों पर निकलती हैं, तो लगता है कि अध्यात्म के जरिए चित्रकूट की लोककला कितनी समृद्ध हो रही है।
कई दशक से मध्य प्रदेश क्षेत्र के नयागाव स्टेट में मंदाकिनी तट पर इस दिन देव दीपावली महोत्सव आयोजित करने वाले राज परिवार के चौबे राजा तेज भान सिंह व चौबे राजा हेमराज सिंह कहते हैं, 'चित्रकूट में दीपावली का पर्व वास्तव में इसी दिन देव दीपावली के रूप में मनाया जाता है। पुरखों ने यहा पर मंदाकिनी के किनारे हर आम और खास के लिये वषरें पहले देव दीपावली को ही दीपावली के स्वरूप में मनाना शुरू किया था। मंदाकिनी के घाटों को दीपकों व रंगोली से सजाने के साथ ही यहा सुप्रसिद्ध लोक गायकों की गायकी का आनंद लोग उठाते हैं। इस दिन चित्रकूट में देश भर से लोग यहा के उत्सव में शामिल होने आते हैं और यहा की समृद्ध लोक-संस्कृति की प्रशसा करते हैं।
दीपावली के बाद पड़ने वाली एकादशी को ही देवोत्थान एकादशी कहते हैं। देव उठनी या प्रबोधिनी एकादशी भी इसे कहा जाता है। कहा जाता है कि इस दिन भगवान विष्णु चार मास की निद्रा त्याग कर इसी एकादशी को जागे थे।
भगवान विष्णु के इस जागरण से हमारे सामाजिक संदर्भों के तार भी जुड़ते हैं। क्योंकि भगवान विष्णु गृहस्थों के देवता माने जाते हैं। उन्हें संसार का पालन-पोषण करने वाला जाना जाता है। उन्हीं की एक इकाई एक आम गृहस्थ भी है, जो अपने परिवार का पालन-पोषण करता है। देवोत्थान एकादशी इसी बहाने गृहस्थों को संदेश देती है कि यदि अतीत में वे अपने कर्तव्यों के प्रति विमुख अथवा सुषुप्तावस्था में थे, तो अब वे जाग जाएं। अपने कर्तव्यों के प्रति जागरण ही देवउठनी या देवोत्थान एकादशी है।
इसके साथ ही सभी अच्छे कार्यों की शुरुआत हो जाती है। यह भी दायित्वों से जुड़े कार्य होते हैं। जबकि देवशयनी एकादशी पर भगवान का लंबी निद्रा में सोना यह नहीं संकेत करता कि लोग भी सो जाएं। कथा के अनुसार, भगवान विष्णु ने भगवती लक्ष्मी को अवकाश देने के लिए ऐसा किया था। इस प्रकरण से हमें गृहलक्ष्मी को सम्मान देने की भावना को बल मिलता है। लेकिन देवोत्थान एकादशी का संदर्भ यही संदेश देता है कि कर्तव्य हमारे लिए अधिक महत्वपूर्ण हैं।
देवोत्थान एकादशी को चित्रकूट में सास्कृतिक और आध्यात्मिक माहौल का सृजन होने लगता है। यहा दीपावली पर इतनी रौनक नहीं होती, जितनी देवोत्थान एकादशी पर। यहा इस दिन देव दीपावली महोत्सव भी आयोजित किया जाता है। देवों के जागरण के साथ ही प्रतिदिन मंदाकिनी नदी के किनारे वैदिक ऋचाओं के साथ ही हर-हर महादेव के समवेत स्वर गूंजने लगते हैं। स्वर्णिम आभा से परिपूर्ण सूर्य के दस्तक देने से पहले ही वे वातावरण को और भी ज्यादा मागलिक बना देते हैं। भोर का सूरज निकलने के पहले ही सूप के साथ थालियों और घटे घड़ियालों के स्वरों में उठो देव -उठो देव के स्वर भारतीय संस्कृति के उस रूप को परिलक्षित करते हैं, जिसमें हम जागरण का संदेश देते हैं। चार माह के विश्राम के बाद देव को नींद से उठाकर उनसे बुंदेली भाषा के सधे लोकसुरों में 'उठो देव उठो देव कुंवारेन कौ ब्याह करौ, ब्याहन कौ चलाऔ करौ, ब्याहन को पुत्र दो.. अपनी मनोकामनाओं की अभिव्यक्ति करते हैं।
मंदाकिनी में झिलमिल आभा..
चित्रकूट में देवोत्थान एकादशी के दिन शाम होते-होते मंदाकिनी के तट की छटा अपने आपमें निराली हो जाती है। दो प्रदेशों की सीमाओं में विभक्त चित्रकूट के घाटों पर चहल-पहल बढ़ जाती है। शाम को घाटों को सुंदर दीपकों से सजाने के साथ ही रंगोली और फूल-पत्तियों से अपना कला-कौशल दिखाने का मौका आता है, तो लोग उसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। दोनो तरफ के घाटों में सुंदर सजावट के बाद प्रतिदिन होने वाली गंगा आरतियों के साथ ही जब विभिन्न गायकों की स्वर लहरिया वाद्य यंत्रों की धुनों पर निकलती हैं, तो लगता है कि अध्यात्म के जरिए चित्रकूट की लोककला कितनी समृद्ध हो रही है।
कई दशक से मध्य प्रदेश क्षेत्र के नयागाव स्टेट में मंदाकिनी तट पर इस दिन देव दीपावली महोत्सव आयोजित करने वाले राज परिवार के चौबे राजा तेज भान सिंह व चौबे राजा हेमराज सिंह कहते हैं, 'चित्रकूट में दीपावली का पर्व वास्तव में इसी दिन देव दीपावली के रूप में मनाया जाता है। पुरखों ने यहा पर मंदाकिनी के किनारे हर आम और खास के लिये वषरें पहले देव दीपावली को ही दीपावली के स्वरूप में मनाना शुरू किया था। मंदाकिनी के घाटों को दीपकों व रंगोली से सजाने के साथ ही यहा सुप्रसिद्ध लोक गायकों की गायकी का आनंद लोग उठाते हैं। इस दिन चित्रकूट में देश भर से लोग यहा के उत्सव में शामिल होने आते हैं और यहा की समृद्ध लोक-संस्कृति की प्रशसा करते हैं।


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