चित्रकूट। 'उल्टा राम जपति जग जाना, वाल्मीकि भये ब्रह्म समाना' श्री राम चरित के अमर गायक गोस्वामी तुलसीदास जी ने जिन महर्षि वाल्मीकि को श्री राम के गुणगान करने के कारण ब्रह्म की श्रेणी में रख दिया था वास्तव में श्री राम के प्रति उनके विचार कुछ अलग थे। इस बात का पुख्ता सबूत महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित 'मूल रामायणम्' में साफ मिलता है कि उन्होंने श्री राम को परमात्मा नही बल्कि मर्यादा की प्रतिमूर्ति पुरुषोत्तम दशरथ नंदन को ही माना है और शायद चित्रकूट में युग ऋषि नाना जी देशमुख की प्रेरणा से बना राम दर्शन इसी बात की अनुभूति कराता है। जहां पर श्री राम को विश्व का पहले समाजसुधारक के रुप में चरितार्थ किया गया है।
महर्षि वाल्मीकि के जन्म स्थान को लेकर चाहे जितने विवाद विद्वानों के बीच हों पर यहां के विद्वान सिर्फ एक कारण के साथ ही पूरे विवादों की इति श्री कर देते हैं।
जगद्गुरु रामभद्राचार्य विकलांग विश्वविद्यालय में संस्कृत विभाग के अधिष्ठाता प्रो. योगेश चंद्र दुबे कहते हैं कि मूल रामायण हो या फिर रामायणम् या फिर बाबा तुलसीकृत श्री राम चरित मानस तीनों में ही चित्रकूट के साथ ही यहां के अन्य प्राकृतिक सुषमा से युक्त स्थानों का विशद वर्णन जितने स्पष्ट तौर पर प्रमाणिकता के साथ किया गया है। उतना किसी और भाषा की या लेखक की रामायण में नही मिलता। इसलिये यह विवाद व्यर्थ का है वे कहां पर रहे हैं। वैसे इस प्रमाणिकता को पूरा विश्व स्वीकार कर चुका है कि श्री राम के चरित्र का पहला प्रक्षेपण महर्षि वाल्मीकि ने ही किया था।
उन्होंने कहा कि मूल रामायण के प्रथम चरण में ही जब देवर्षि नारद से महर्षि वाल्मीकि प्रश्न करते हैं कि पूरी सृष्टि में कौन सा ऐसा पुरुष है जिसका चरित्र और कर्तव्य निष्कलंक है तो उनका जवाब दशरथ नंदन श्री राम ही होता है।
कहा कि श्री राम जी का चरित्र ही एक ऐसा चरित्र है जो अन्य देव पुरुषों से उन्हें अलग करता है। पुरुषोत्तम की संज्ञा केवल उन्हें इसलिये दी गई है कि सोलह कलायें केवल श्री राम में है। श्री कृष्ण और अन्य देव पुरुषों में यह पूरी कलायें नही पाई गई।
महर्षि वाल्मीकि के जन्म स्थान को लेकर चाहे जितने विवाद विद्वानों के बीच हों पर यहां के विद्वान सिर्फ एक कारण के साथ ही पूरे विवादों की इति श्री कर देते हैं।
जगद्गुरु रामभद्राचार्य विकलांग विश्वविद्यालय में संस्कृत विभाग के अधिष्ठाता प्रो. योगेश चंद्र दुबे कहते हैं कि मूल रामायण हो या फिर रामायणम् या फिर बाबा तुलसीकृत श्री राम चरित मानस तीनों में ही चित्रकूट के साथ ही यहां के अन्य प्राकृतिक सुषमा से युक्त स्थानों का विशद वर्णन जितने स्पष्ट तौर पर प्रमाणिकता के साथ किया गया है। उतना किसी और भाषा की या लेखक की रामायण में नही मिलता। इसलिये यह विवाद व्यर्थ का है वे कहां पर रहे हैं। वैसे इस प्रमाणिकता को पूरा विश्व स्वीकार कर चुका है कि श्री राम के चरित्र का पहला प्रक्षेपण महर्षि वाल्मीकि ने ही किया था।
उन्होंने कहा कि मूल रामायण के प्रथम चरण में ही जब देवर्षि नारद से महर्षि वाल्मीकि प्रश्न करते हैं कि पूरी सृष्टि में कौन सा ऐसा पुरुष है जिसका चरित्र और कर्तव्य निष्कलंक है तो उनका जवाब दशरथ नंदन श्री राम ही होता है।
कहा कि श्री राम जी का चरित्र ही एक ऐसा चरित्र है जो अन्य देव पुरुषों से उन्हें अलग करता है। पुरुषोत्तम की संज्ञा केवल उन्हें इसलिये दी गई है कि सोलह कलायें केवल श्री राम में है। श्री कृष्ण और अन्य देव पुरुषों में यह पूरी कलायें नही पाई गई।

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