चित्रकूट।संदीप रिछारिया कभी मुगलिया सल्तनत को विस्तार देने के उद्देश्य से देश भर के मंदिरों और मूर्तियों को तोड़कर हिंदू संस्कृति पर कुठाराघात करने वाले सम्राट औरंगजेब की जिंदगी का एक अध्याय ऐसा यहां जीती जागती अवस्था में मौजूद है जो उनकी विपरीत छवि को पेश करता है। देश में हिंदू मूर्तियों को तोड़ने वाले इस सम्राट ने चित्रकूट में न केवल एक विशाल मंदिर बनवाया बल्कि मंदिर की सम्पूर्ण व्यवस्था के लिये कर मुक्त आठ गांवों की जमीन दी व रोजाना की पूजा, भोग की व्यवस्था के लिये एक रुपया भी देना मुकर्रर किया। लेकिन आज इस विशाल मंदिर की हालत यह है कि इसे अपनों ने ही बरबाद कर दिया । पहले मंदिर के एक पूर्व महंत की नशे की लत ने गांवों की जमीनों को बरबाद कर दिया और विशाल मंदिर के बड़े भाग पर अतिक्रमणकारियों के कब्जे को लेकर जब विवाद बढ़ा तो इस पर जिला प्रशासन ने अपना रिसीवर नियुक्त कर दिया। इन सब के बावजूद आज भी देश के सम्राट के नतमस्तक होने की कहानी कहता यह अपनी गौरवगाथा दोहरा रहा है। यह मंदिर चित्रकूट में पवित्र मंदाकिनी के किनारे बना बाला जी का मंदिर है। जो निर्वाणी संत बाबा बालक दास जी महाराज को मुगलिया सल्तनत के जहांपनाह औरंगजेब द्वारा बनवाकर दिया गया था।
मंदिर के महंत राम नरेश दास बताते हैं कि 1683 ई. में सम्राट औरंगजेब चित्रकूट आया और उसने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि यहां के सब मंदिरों और मूर्तियों को तोड़ दिया जाये। रात होने के कारण यह काम सुबह से प्रारंभ किया जाना था। तभी अचानक रात में सभी सैनिकों के साथ खुद सम्राट के पेट में तेज दर्द प्रारंभ हो गया। इस दर्द से निजात पाने का उपाय उनके साथ आये हकीम नही कर सके। आसपास के लोगों ने उन्हें बताया कि चित्रकूट विलक्षण चमत्कारी संतों की भूमि है पास ही बाबा बालक दास जी रहते हैं उनसे बात करें तो शायद कुछ हो जाये। जहांपनाह खुद ही पैदल चल कर बाबा बालक दास की धूनी में पहुंचे। कातर दृष्टि से क्षमा याचना करने के बाद अपना कष्ट बताया। बाबा ने अपनी धूनी से उन्हें भभूती देकर कहा कि इसे खुद खाओ और सभी सैनिकों को भी खिलाओ। चमत्कारिक रुप से सभी का पेट दर्द सही हो गया। बाबा की चमत्कारिक सिद्धि से प्रभावित होकर औरंगजेब ने जब बाबा से कुछ मांगने को कहा तो बाबा नाराज हो उठे और उन्होंने चिमटा लेकर बादशाह को दौड़ा लिया। बाद में औरंगजेब की काफी आरजू मिन्नत करने पर उन्होंने कहा कि तुम पूरे देश में हिंदू मूर्तियों व मंदिरों का अपमान करते रहे हो यहां पर मंदिर बनवाओ और उसमें खुद ही मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा करो और इसके बाद तुम कभी किसी मूर्ति को तोड़ने का आदेश मत देना। बाबा की बात मानकर उसने न केवल यहां पर विशाल मंदिर बनवाया बल्कि मंदिर की व्यवस्था को सुचारु रुप से चलाने के लिये ठाकुर जी के सम्मान में 8 गांव देवखरी, हिनौता, चित्रकूट, रौदार, सिरिया, पड़री, जखा, दोहरिया दान में दिये। इसके साथ ही 330 बीघा बिना लगानी खेती काबिल जमीन राठ परगना के जोरा खांड गांव की 150 बीघा व अमरावती गांव की 180 बीघा जमीन भी दी। इसके साथ ही कोनी परोठा परगना के लगान से एक रुपया रोज भोग के लिये देना मुकर्रर किया।
वैसे सम्राट औरंगजेब ने बाबा के प्रति पूरा सम्मान दिखाते हुये इसे एक फरमान के द्वारा अपने शासनकाल के पैंतीसवें वर्ष मुकद्दस रमजान माह की 19 वीं तारीख को लेखक नवाब रफीउक कादर सहादत खां से तांब्र पत्र में लिपिबद्ध करवाकर मंदिर को सौंपा और उसमें इस बात का भी जिक्र किया कि आने वाली पीढि़यों में भी इस तरह की सहायता जारी रहेगी। आलमगीर का फरमान चित्रकूट के अधिपति पन्ना नरेश हिंदूपन्त ने भी इस बात का अक्षरश: पालन किया। अंग्रेजों ने भी उसे ज्यों का त्यों बरकरार रखा। आजादी के बाद जमींदारी उन्मूलन हो जाने के बाद भी इन गांवों का कुछ प्रतिकर मंदिर को मिलता रहा और मंदिर के वारिस आठ गांवों पर खेती करवाकर उपज लेते रहे। लगभग तीस साल पहले मंदिर के वैभव पर ग्रहण लगना प्रारंभ हुआ। मंदिर के एक महंत ने तो अपनी नशे की लत पूरी करने के लिये खेती पर ध्यान देने के बजाय जमीन को ही बेंचना प्रारंभ कर दिया। मंदिर परिसर पर बने कमरों में भी तमाम लोगों ने कब्जा करना प्रारंभ कर दिया। धीरे-धीरे सोलह बीघे के विशाल मंदिर परिसर पर केवल गर्भगृह पर ही पुजारियों का कब्जा रह सका। लगातार स्थिति बिगड़ती देखकर जिला प्रशासन ने इसे अपने आधिपत्य में ले लिया। तहसीलदार को इसका रिसीवर बना दिया गया।
अखिल भारतीय समाजसेवा संस्थान के संस्थापक गोपाल भाई कहते हैं कि आज देश में सांप्रदायिक सद्भाव की भावना की बेहद जरुरत है और इस तरह की बेशकीमती मिशाल बरबाद हो रही है। सरकारी संरक्षण के नाम पर भी इसे कुछ प्राप्त नही हो रहा है।
पुरातत्व विभाग के मंडल अधिकारी रणजीत सिंह कहते हैं कि उनको औरंगजेब के बनवाये बाला जी मंदिर की जानकारी हुई थी। इसके लिये लिखा पढ़ी की गई है, पर मामला अदालत में होने के कारण अभी यह मंदिर उनके विभाग को नही मिला है।
महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग के प्राध्यापक डा. कमलेश थापक कहते हैं कि चित्रकूट में ही आकर औरंगजेब को वास्तव में हिंदू ऋषियों के महत्व का ज्ञान हुआ था। उसने यहां पर बाबा बालकदास का चमत्कार देखकर न केवल मंदिर बनवाया बल्कि जागीरें भी दी। इस स्थान का विकास तो सरकार की जिम्मेदारी होना चाहिये।
एक दर्द यह भी
मंदिर के महंत रामनरेश दास बताते हैं कि विवादों के कारण सरकारी हस्तक्षेप हुआ। मंदिर के गर्भगृह को छोड़कर कुछ कमरों में रिसीवर ने न केवल तालाबंद कर दिया बल्कि मंदिर की सबसे कीमती धरोहर सम्राट औंरगजेब द्वारा दिया गया शाही फरमान भी सरकारी अधिकारी उठा ले गये। यह शाही फरमान तांबे पर उत्कीणित कर बनाया गया था। तब से आज तक कोई भी सरकारी अधिकारी यह बताने को तैयार नही की यह फरमान है कहां। उन्होंने आशंका जताई कि शायद यह फरमान सरकारी अधिकारियों ने गायब कर दिया है। इसलिये मंदिर में आने वालों को कागज पर फोटो कापी कराये हुये फरमान को ही दिखाया जाता है।
कहते हैं अधिकारी
मंदिर के रिसीवर बताये जाने वाले तहसीलदार अश्विनी कुमार श्रीवास्तव ने कहा कि अब वहां का रिसीवर तहसीलदार नही है। बल्कि पूर्व एडीएम ने एक समिति बनाकर उसको मंदिर की देखभाल की पूरी जिम्मेदारी दे दी थी। तब से समिति का अध्यक्ष प्रधान और उसके सदस्य ही जारौमाफी की जमीन का गल्ला ले रहे हैं। फरमान को लाये जाने के बावत उन्होंने कहा कि यह उनके पहले का मामला है इसलिये इस बात की उन्हें जानकारी नही है।
मंदिर के महंत राम नरेश दास बताते हैं कि 1683 ई. में सम्राट औरंगजेब चित्रकूट आया और उसने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि यहां के सब मंदिरों और मूर्तियों को तोड़ दिया जाये। रात होने के कारण यह काम सुबह से प्रारंभ किया जाना था। तभी अचानक रात में सभी सैनिकों के साथ खुद सम्राट के पेट में तेज दर्द प्रारंभ हो गया। इस दर्द से निजात पाने का उपाय उनके साथ आये हकीम नही कर सके। आसपास के लोगों ने उन्हें बताया कि चित्रकूट विलक्षण चमत्कारी संतों की भूमि है पास ही बाबा बालक दास जी रहते हैं उनसे बात करें तो शायद कुछ हो जाये। जहांपनाह खुद ही पैदल चल कर बाबा बालक दास की धूनी में पहुंचे। कातर दृष्टि से क्षमा याचना करने के बाद अपना कष्ट बताया। बाबा ने अपनी धूनी से उन्हें भभूती देकर कहा कि इसे खुद खाओ और सभी सैनिकों को भी खिलाओ। चमत्कारिक रुप से सभी का पेट दर्द सही हो गया। बाबा की चमत्कारिक सिद्धि से प्रभावित होकर औरंगजेब ने जब बाबा से कुछ मांगने को कहा तो बाबा नाराज हो उठे और उन्होंने चिमटा लेकर बादशाह को दौड़ा लिया। बाद में औरंगजेब की काफी आरजू मिन्नत करने पर उन्होंने कहा कि तुम पूरे देश में हिंदू मूर्तियों व मंदिरों का अपमान करते रहे हो यहां पर मंदिर बनवाओ और उसमें खुद ही मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा करो और इसके बाद तुम कभी किसी मूर्ति को तोड़ने का आदेश मत देना। बाबा की बात मानकर उसने न केवल यहां पर विशाल मंदिर बनवाया बल्कि मंदिर की व्यवस्था को सुचारु रुप से चलाने के लिये ठाकुर जी के सम्मान में 8 गांव देवखरी, हिनौता, चित्रकूट, रौदार, सिरिया, पड़री, जखा, दोहरिया दान में दिये। इसके साथ ही 330 बीघा बिना लगानी खेती काबिल जमीन राठ परगना के जोरा खांड गांव की 150 बीघा व अमरावती गांव की 180 बीघा जमीन भी दी। इसके साथ ही कोनी परोठा परगना के लगान से एक रुपया रोज भोग के लिये देना मुकर्रर किया।
वैसे सम्राट औरंगजेब ने बाबा के प्रति पूरा सम्मान दिखाते हुये इसे एक फरमान के द्वारा अपने शासनकाल के पैंतीसवें वर्ष मुकद्दस रमजान माह की 19 वीं तारीख को लेखक नवाब रफीउक कादर सहादत खां से तांब्र पत्र में लिपिबद्ध करवाकर मंदिर को सौंपा और उसमें इस बात का भी जिक्र किया कि आने वाली पीढि़यों में भी इस तरह की सहायता जारी रहेगी। आलमगीर का फरमान चित्रकूट के अधिपति पन्ना नरेश हिंदूपन्त ने भी इस बात का अक्षरश: पालन किया। अंग्रेजों ने भी उसे ज्यों का त्यों बरकरार रखा। आजादी के बाद जमींदारी उन्मूलन हो जाने के बाद भी इन गांवों का कुछ प्रतिकर मंदिर को मिलता रहा और मंदिर के वारिस आठ गांवों पर खेती करवाकर उपज लेते रहे। लगभग तीस साल पहले मंदिर के वैभव पर ग्रहण लगना प्रारंभ हुआ। मंदिर के एक महंत ने तो अपनी नशे की लत पूरी करने के लिये खेती पर ध्यान देने के बजाय जमीन को ही बेंचना प्रारंभ कर दिया। मंदिर परिसर पर बने कमरों में भी तमाम लोगों ने कब्जा करना प्रारंभ कर दिया। धीरे-धीरे सोलह बीघे के विशाल मंदिर परिसर पर केवल गर्भगृह पर ही पुजारियों का कब्जा रह सका। लगातार स्थिति बिगड़ती देखकर जिला प्रशासन ने इसे अपने आधिपत्य में ले लिया। तहसीलदार को इसका रिसीवर बना दिया गया।
अखिल भारतीय समाजसेवा संस्थान के संस्थापक गोपाल भाई कहते हैं कि आज देश में सांप्रदायिक सद्भाव की भावना की बेहद जरुरत है और इस तरह की बेशकीमती मिशाल बरबाद हो रही है। सरकारी संरक्षण के नाम पर भी इसे कुछ प्राप्त नही हो रहा है।
पुरातत्व विभाग के मंडल अधिकारी रणजीत सिंह कहते हैं कि उनको औरंगजेब के बनवाये बाला जी मंदिर की जानकारी हुई थी। इसके लिये लिखा पढ़ी की गई है, पर मामला अदालत में होने के कारण अभी यह मंदिर उनके विभाग को नही मिला है।
महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग के प्राध्यापक डा. कमलेश थापक कहते हैं कि चित्रकूट में ही आकर औरंगजेब को वास्तव में हिंदू ऋषियों के महत्व का ज्ञान हुआ था। उसने यहां पर बाबा बालकदास का चमत्कार देखकर न केवल मंदिर बनवाया बल्कि जागीरें भी दी। इस स्थान का विकास तो सरकार की जिम्मेदारी होना चाहिये।
एक दर्द यह भी
मंदिर के महंत रामनरेश दास बताते हैं कि विवादों के कारण सरकारी हस्तक्षेप हुआ। मंदिर के गर्भगृह को छोड़कर कुछ कमरों में रिसीवर ने न केवल तालाबंद कर दिया बल्कि मंदिर की सबसे कीमती धरोहर सम्राट औंरगजेब द्वारा दिया गया शाही फरमान भी सरकारी अधिकारी उठा ले गये। यह शाही फरमान तांबे पर उत्कीणित कर बनाया गया था। तब से आज तक कोई भी सरकारी अधिकारी यह बताने को तैयार नही की यह फरमान है कहां। उन्होंने आशंका जताई कि शायद यह फरमान सरकारी अधिकारियों ने गायब कर दिया है। इसलिये मंदिर में आने वालों को कागज पर फोटो कापी कराये हुये फरमान को ही दिखाया जाता है।
कहते हैं अधिकारी
मंदिर के रिसीवर बताये जाने वाले तहसीलदार अश्विनी कुमार श्रीवास्तव ने कहा कि अब वहां का रिसीवर तहसीलदार नही है। बल्कि पूर्व एडीएम ने एक समिति बनाकर उसको मंदिर की देखभाल की पूरी जिम्मेदारी दे दी थी। तब से समिति का अध्यक्ष प्रधान और उसके सदस्य ही जारौमाफी की जमीन का गल्ला ले रहे हैं। फरमान को लाये जाने के बावत उन्होंने कहा कि यह उनके पहले का मामला है इसलिये इस बात की उन्हें जानकारी नही है।


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