अपने पिता दरबारी लाल पटेल के साथ व भाई के साथ रवि नंदन

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रविवार, 27 मार्च 2011

यहां पर स्थापित है नाथ संप्रदाय की पहली गादी

चित्रकूट, संवाददाता: 'हानि लाभ जीवन मरण यश अपयश विधि हाथ' भले ही यह लाइनें गोस्वामी तुलसीदास ने साढे़ पांच सौ साल पहले ही लिखी हों पर वास्तव में इन शब्दों के गूढ़ मायने चित्रकूट की धरती पर पांच हजार साल पहले ही व्यक्त किये जा चुके थे। कैलाश पर्वत पर भगवान शंकर से दीक्षा के लेने के बाद जब स्वामी मच्कि्षन्द्र नाथ को विश्व भ्रमण का आदेश मिला तो उनके कदम चित्रकूट पहुंचकर थम गये। यहां की प्राकृतिक सुषमा और विविधता से वह इतने प्रभावित हुये कि उन्होंने अपनी पहली गादी यहीं स्थापित कर दी। यहीं चित्रकूट में अनुसुइया के जंगलों पर उन्हें अपने सुयोग्य शिष्य के रूप में गोरखनाथ भी मिल गये। गादी की स्थापना करने के साथ गुरु गोरखनाथ को कैलाश ले जाकर अपनी दिव्य शक्तियां देने के बाद वे वहीं पंच तत्वों में विलीन हो गये। गुरु गोखरनाथ ने स्यामल नाथ को अपना शिष्य बनाया। उन्होंने भी गुप्त नाथ को अपना शिष्य बनाया। गुरु गुप्त नाथ के समय नाथ संप्रदाय के इस प्रथम तीर्थ का विस्तार काफी तेजी से हुआ। पूरे देश से यहां पर आने वाले ज्ञान पिपासु अपनी ज्ञान साधना को पूर्ण करते रहे वहीं उन्होंने यहां पर व्यंकटेश भगवान की मूर्तियों के विग्रहों की स्थापना कर भगवान बाला जी के मंदिर की स्थापना की। नाथ संप्रदाय की पहली गादी को चित्रकूट में होने की मान्यता यहां पर महाराज गुप्त नाथ के समय ही मिली। यह परंपरा परमहंस नाथ, ब्रह्ममनन्द नाथ, माधव नाथ से बढ़कर अब वर्तमान गुरु योगेश्यवरानंद मंगलनाथ तक आ पहुंची है।

नाथ संप्रदाय के प्रमुख आचार्य योगेश्यवरानंद मंगलनाथ जी महाराज कहते हैं कि नाथ संप्रदाय का मतलब किसी को डराना नही बल्कि सभी प्राणियों में सद्गुणों को विस्तारित करना है। हर व्यक्ति में भगवान का अंश है। उसे किसी का डर नही होना चाहिये। मनुष्य को हानि लाभ जीवन मरण यश और अपयश तो विधि के विधान के अनुरूप ही मिलता है पर साधना वास्तव में उसे सभी कष्टों में खड़ा रहने की कला सिखाती है। जीवन संग्राम में विजय पथ का रास्ता केवल साधना से ही संभव है। आदि नाथ भगवान शंकर के डमरू से निकला ओंकार आज भी उतना ही प्रभावी है जितना प्रभावी वह स्वामी मच्छिन्द्र नाथ जी के समय पर था। वे कहते हैं कि दर्शन ही सभी प्रकार के ज्ञान और विज्ञान की मां है। अगर दर्शन नही होता तो किसी प्रकार की वस्तुओं का जन्म ही नही होता। खुद को शांत रखने के लिये वे साधना करने पर बल देते हैं और थोड़ा समय अपने लिये निकाल लेने पर ऐसा करना संभव बताते हैं।

पेयजल समस्या से निपटने के लिये प्रशासन ने कसी कमर

सर्वाधिक गांव हैं मानिकपुर ब्लाक में

-पहाड़ी ब्लाक में हो सकती है इस बार ज्यादा दिक्कत
चित्रकूट, संवाददाता: अब तो प्यास को लेकर मारामारी की स्थिति पैदा होने ही वाली है। पानी की समस्या को लेकर ऐसे हालत बनते जा रहे हैं कि आने वाले दिन भयावह होने वाले हैं। वैसे सरकारी आंकड़ों में पेयजल समस्या के मामले में मानिकपुर ब्लाक को जहां सर्वाधिक संवेदनशील घोषित किया गया है वहीं मंदाकिनी के सूख जाने के बाद अब तो तो तिरहार क्षेत्र में इस बार दिक्कतें काफी बढ़ सकती हैं। वैसे दो दिन पहले ही मुख्यालय के समीपवर्ती गांव में हैंडपम्पों के जवाब देने के कारण जल निगम को पानी सप्लाई देने के लिये रात में टयूब बेल चलाये जाने के निर्देश खुद जिलाधिकारी ने दिये हैं। फिलहाल जल निगम ने प्यासों को पानी देने के लिये अभी से अपनी कमर कस ली है। पिछले सालों की तरह ही इस साल भी टैंकरों के सहारे प्यासों की प्यास को बुझाने का इंतजाम किया जायेगा। इस योजना में लगभग 69 लाख रुपयों के खर्च होने का स्टीमेट बनाया है।
जल निगम अस्थायी शाखा के परियोजना प्रबंधक डी के शुक्ला बताते हैं कि पानी को लेकर अभी से कार्य योजना बनाकर उसकी स्वीकृति विभागीय स्तर पर ले ली गई है। मानिकपुर ब्लाक के इटवां गांव से पानी की दिक्कत होने की पहली शिकायत आयी है। सर्वे के लिये अधिकारियों को भेजा गया है। अगर जरूरत होगी तो टैंकर से पानी की सप्लाई प्रारंभ कर दी जायेगी।
उन्होंने बताया कि खुटहा, रैपुरवा माफी, घुरेटनपुर, मानपुर यादव के डेरा में, रसिन मजरा -चक्कला, ब्यूर, छिवलहा, गौशाला, महोदव व रसिन गांव में हरिजन बस्ती, ग्राम पंचायत बैहार मजरा डोकहा पुरवा, भभई, महराजपुर, बकटा बुजुर्ग, इटौरा, कपना, पथरामानी, पहाड़ी कस्बा व कर्का पडरिया का मजरा वेटन का पुरवा व कोलहाई, उमरी का मजरा बगीचा का पुरवा, डांडी व कोलान, किहुनिया का मजरा पयासी पुरवा, ऊंचाडीह का मजरा गढ़वा, टेढुवा, झलमल, कोलान,गुलरियापुरवा, डोडामाफी का मजरा सोसायटी कोलान, गोपीपुर , ग्राम सेमरदहा, खांचा पुरवा, गदरहापुरवा, खैराहनपुरवा, कोटा कदैला का मजरा हडहाई पुरवा, चूल्ही, रामपुर कल्याणगढ़, ददरी माफी का मजरा छोटी बिलहरी, बराह माफी, सरहट मानिकपुर देहात, सकरौंहा, अमचुर नेरूआ, कोटा कदैला का मजरा कदैला पुरवा, सिंगवन पुरवा, रूकमा बुजुर्ग का मजरा खांचा पुरवा, टिकरिया मजरा जमुनिहाई, निही मजरा भाटा, सिमरधा बडौदा, मारकुंडी डांडी कोलान, महुलिया, टंकी पुरवा, भभरा पुरवा, खिरवा पुरवा, चमरवा पुरवा, इटवां, महुलिया व देवरा आदि गांवों को आने वाले समय में पेयजल किल्लत होने वाले संभावितों में शामिल कर लिया गया है। टैंकरों की व्यवस्था भी कर ली गई है। पीने के पानी की समस्या की जानकारी मिलने पर तुरन्त ही टैंकर भेज दिये जायेंगे।



अगले साल चित्रकूट में होगा श्री राम यज्ञ

चित्रकूट, संवाददाता: भगवान राम बाबा भोलेनाथ की पूजा करते हैं तो शंकर भी हर समय भगवान राम का ही जप करते हैं। आध्यात्म की इस बड़ी गुत्थी को सही सिद्ध करने का काम नाथ संप्रदाय के साधकों द्वारा चित्रकूट की धरती पर अगले साल किया जायेगा। योगाभ्यानंद मंगलनाथ महाराज ने अगले साल की चैत्र राम नवमी को बाला जी मंदिर में श्री राम यज्ञ किये जाने की घोषणा की। शनिवार को नाथ संप्रदाय के प्रमुख योगाभ्यानंद मंगलनाथ महाराज ने अपने शिष्यों को संदेश देते हुये कहा कि अब उनके जीवन के पचहत्तर बंसत बीत चुके हैं और भारतीय दर्शन की आश्रम व्यवस्था की डोर उन्हें सन्यास आश्रम में जाने के लिये कह रही है। इसलिये अब पूर्ण रूप से वे भगवा वस्त्र धारण कर सन्यासी के वेश में रहकर सभी को आत्म कल्याण के साथ ही पूरे विश्व के कल्याण के गुर सिखाते रहेंगे। इसके साथ ही उन्होंने वर्ष 2012 में चित्रकूट में नाथ संप्रदाय की पहली गादी पर चैत्र माह की राम नवमी को श्री राम यज्ञ करने की घोषणा की। इस दौरान टाउन हाल पर बाहर से आये स्थानीय हजारों भक्तों की मौजूदगी में नव नाथ यज्ञ की पूर्णाहुति हुई। इसके पूर्व मंगलनाथ महाराज ने भगवान भोले नाथ का रूद्राभिषेक करने के साथ ही नारायण स्त्रोत का पाठ किया।
इस दौरान व्यवस्था का गुरुतर भार उठाने में आनंद राव तैलंग, श्री रंग परस पारखी, नरेन्द्र केवले, अतुल पांडरीकर, मधुकर राव नायगांवकर, पद्माकर चोरधरे, कु. भालेन्द्र सिंह, श्री राम पांडेय, सुरेश राम हरि जोग, इन्द्र कुमार त्रिपाठी व गोबिंद पयासी आदि लोग शामिल रहे।

..तो नहीं बदल सकी अलंकृत उद्यान की दशा

चित्रकूट, संवाददाता: मंशा तो थी कि यहां पर लोग सुबह और शाम की ताजी हवा खाकर अपने आपको स्वस्थ रखे। कार्य योजना भी बनी। बड़ी-बड़ी बातें हुई और पत्थर लगाकर काम को शुरू करने का दावा भी किया गया पर शहर के बच्चे, बूढे और जवान इसका इंतजार ही करते रह गये कि कब यह योजना पूरी होगी और औषधियों से युक्त ताजी हवा में उन्हें टहलने का मौका मिलेगा। पिछले आठ सालों से जिलाधिकारी आवास के पीछे की जमीन पर अलंकृत उद्यान की योजना को पूरा किया जाने से ज्यादा टरकाने का काम ज्यादा दिखाई देता है। महत्वपूर्ण बात तो यह है कि यह एक ऐसा स्थान है जिसमें एक बार नही दो बार एक ही काम के लिये शुभारंभ जिलाधिकारियों ने किया पर उनके द्वारा तैयार करवाई गई कार्ययोजना अभी तक पूरी नही हो सकी।

पिछले आठ सालों में अलंकृत उद्यान को अलग-अलग तरह से दो बार उद्घाटन होने के बाद भी अभी यह पार्क डरावनी जगह के तौर पर ही जाना जाता है। गौरतलब है कि जिला बनने के बाद जिलाधिकारी जगन्नाथ सिंह ने सबसे पहले इस खाली पड़ी जमीन की चिंता व्यक्त की थी। उन्होने पहली बार उद्यान विभाग को लगभग एक हेक्टेयर का पूरा रकबा राजकीय उद्यान बनाने के लिये दिलवाया था। उनकी मंशा थी कि यहां पर न केवल अच्छे फल और फूलों वाले पौधों का उत्पादन किया जाये और इसे घूमने के पार्क के रूप में विकसित किया जाये।
वर्ष 2003 में तत्कालीन जिलाधिकारी राम सूरत दुबे ने यहां पर अलंकृत उद्यान की परिकल्पना कर 13 मई को इसका विधिवत शुभारंभ किया। उनकी कार्ययोजना में बच्चों के लिये पार्क जिसमें झूले लगे हों और बड़ों के टहलने के लिये पाथ वे तथा औषधीय पौधों की प्रचुरता वाले पार्क का निर्माण हो। बच्चों के मनोरंजन के लिये झूले और अन्य समान तो लगाये गये पर औषधियों से भरा बगीचा अलंकृत उद्यान नही बन सका। इसके बाद आये जिलाधिकारियों ने इसकी सुधि नही ली। इसके बाद वर्ष 2009 में पूर्व जिलाधिकारी हृदेश कुमार ने फिर से एक बार रूचि लेकर एक जुलाई को राजकीय अलंकृत उद्यान में बागवानी के शुभारंभ का काम कर दिया। जिला उद्यान अधिकारी धीरेन्द्र मिश्र ने बताया अलंकृत उद्यान में पिछले साल काफी पौधे लगवाये गये थे। अभी पौधों के बढ़ने में समय है। फिर भी उनकी देखरेख के लिये लोग लगे हैं जल्द ही पार्क का स्वरूप दिखाई देगा।




बुधवार, 23 मार्च 2011

पानी की कमी से जूझ रहे पाठा के कलाकार

चित्रकूट, संवाददाता : एक नही आश्चर्य करने के कई कारण फिर भी रहा वही रोना? तीर्थनगरी के प्रवेश द्वार रानीपुर भट्ट के अखिल भारतीय समाज सेवा संस्थान के भारत जननी परिसर में परिसर में चौथे लोकलय समारोह में आये पाठा के कलाकारों ने मंच पर गाते और थिरकते हुये भले ही उत्साह और उमंग से लबरेज रहे हों पर मंच से उतरने के बाद जब उनसे उनके इलाके में पीने के पानी की समस्या पर जागरण ने सवाल पूंछे तो उनका दर्द चेहरों पर साफ उभर आया।
मानिकपुर के पाठा क्षेत्र के गांव सरहट, गोपीपुर , करौंहा, टिकरिया, जमुनिहाई, छोटी व बड़ी पाटिन व मोटवन आदि गांवों से आये कलाकारों ने रूंधे गले से पानी की कमी की बात कही।
टिकरिया के रहने वाले राजाराम, आनंद, सुधा व संगीता ने कहा कि हैंडपम्पों ने साथ छोड़ना प्रारंभ कर दिया है। कुंये और तालाब तो पहले ही बरबाद हो चुके थे। अब तो केवल चोहड़ों का भरोसा है।
मारकुंडी की रहने वाली गीता, सुमन ने कहा कि अभी तो हैंडपम्पों में रूक-रूक कर पानी आ रहा है लेकिन जल्द ही यह जवाब दे जायेगे फिर तो तीन किलोमीटर दूर चोहडे से पानी भरना उनकी मजबूरी होगी।
उमेश, संजू, सुखराम, सुधा आदि ने तो इस बार की होली को पानी की कमी के कारण फीका बताते हुये कहा कि आने वाले दिनों में स्थिति क्या होगी क्योंकि अभी तो पूरी गर्मी ही पड़ी हुई है। उन्होंने कहा कि वे देहाती कलाकार हैं अगर सरकार वास्तव में उनका भला चाहती है तो अन्य योजनाओं के पहले पानी पिलाने की योजना पर काम करे जिससे कम से कम वे जिंदा तो रह सकें।

अभी तो जारी है इकतारे की यात्रा

चित्रकूट, संवाददाता: 'तन तंबूरा तार मन अद्भुत है यह साज, मन के हाथों बंध चला मन की है आवाज' भगवान श्री कृष्ण की भक्ति वाल्सल्य के रूप में करने वाले महाकवि सूरदास हों या फिर स्वामी हरिदास दोनों ने अपनी भक्ति का माध्यम इकतारे को ही बनाया। भक्ति कालीन परंपरा के साथ ही लोकगायकों को जब नादस्वरम के रूप में जब तंबूरे से स्वर मिले तो उनकी आवाजों का पैना पन बढ़ या। इतना ही नही सितार और गिटार का जनक इकतारे को भले ही आज बड़े संगीत कारों ने विलुप्ति की श्रेंणी में रख छोड़ा हो पर अभी भी बुंदेली विधाओं के गीत संगीत में तो इसका व्यापक प्रयोग दिखाई देता है। एक ही तार पर तबूरे के माध्यम से हवा में जो स्वर उत्पन्न होते हैं उन्हें नादस्वर मानने वाले कलाकार तो कहते हैं कि यह तो भगवान शंकर का प्रसाद है। क्योकि डमरू को पहला वाद्ययंत्र माना जाता है और उसमें भी डोरी तो कसी जाती है। इसकी सहायता से ही स्वर मिलता है। जो आवाज को स्थायित्व देने का काम करता है।

बांदा के बडोखर से आये कलाकार छोटे लाल व पर्वत लाल कहते कि इकतारे का प्रयोग तो पहले काफी फिल्मों में भी किया गया। आज भी कभी-कभी इसके सुरों का उपयोग दिखाई देता है। वैसे समय की मार के चलते सस्ता किंतु उपयोगी वाद्ययंत्र अब समाप्त होने की कगार पर है। इसको संरक्षण देने की आवश्यकता है।

गुरुवार, 23 दिसंबर 2010

जागने का दिन

                             संदीप रिछारिया
दीपावली के बाद पड़ने वाली एकादशी को ही देवोत्थान एकादशी कहते हैं। देव उठनी या प्रबोधिनी एकादशी भी इसे कहा जाता है। कहा जाता है कि इस दिन भगवान विष्णु चार मास की निद्रा त्याग कर इसी एकादशी को जागे थे।

भगवान विष्णु के इस जागरण से हमारे सामाजिक संदर्भों के तार भी जुड़ते हैं। क्योंकि भगवान विष्णु गृहस्थों के देवता माने जाते हैं। उन्हें संसार का पालन-पोषण करने वाला जाना जाता है। उन्हीं की एक इकाई एक आम गृहस्थ भी है, जो अपने परिवार का पालन-पोषण करता है। देवोत्थान एकादशी इसी बहाने गृहस्थों को संदेश देती है कि यदि अतीत में वे अपने कर्तव्यों के प्रति विमुख अथवा सुषुप्तावस्था में थे, तो अब वे जाग जाएं। अपने कर्तव्यों के प्रति जागरण ही देवउठनी या देवोत्थान एकादशी है।
इसके साथ ही सभी अच्छे कार्यों की शुरुआत हो जाती है। यह भी दायित्वों से जुड़े कार्य होते हैं। जबकि देवशयनी एकादशी पर भगवान का लंबी निद्रा में सोना यह नहीं संकेत करता कि लोग भी सो जाएं। कथा के अनुसार, भगवान विष्णु ने भगवती लक्ष्मी को अवकाश देने के लिए ऐसा किया था। इस प्रकरण से हमें गृहलक्ष्मी को सम्मान देने की भावना को बल मिलता है। लेकिन देवोत्थान एकादशी का संदर्भ यही संदेश देता है कि कर्तव्य हमारे लिए अधिक महत्वपूर्ण हैं।
देवोत्थान एकादशी को चित्रकूट में सास्कृतिक और आध्यात्मिक माहौल का सृजन होने लगता है। यहा दीपावली पर इतनी रौनक नहीं होती, जितनी देवोत्थान एकादशी पर। यहा इस दिन देव दीपावली महोत्सव भी आयोजित किया जाता है। देवों के जागरण के साथ ही प्रतिदिन मंदाकिनी नदी के किनारे वैदिक ऋचाओं के साथ ही हर-हर महादेव के समवेत स्वर गूंजने लगते हैं। स्वर्णिम आभा से परिपूर्ण सूर्य के दस्तक देने से पहले ही वे वातावरण को और भी ज्यादा मागलिक बना देते हैं। भोर का सूरज निकलने के पहले ही सूप के साथ थालियों और घटे घड़ियालों के स्वरों में उठो देव -उठो देव के स्वर भारतीय संस्कृति के उस रूप को परिलक्षित करते हैं, जिसमें हम जागरण का संदेश देते हैं। चार माह के विश्राम के बाद देव को नींद से उठाकर उनसे बुंदेली भाषा के सधे लोकसुरों में 'उठो देव उठो देव कुंवारेन कौ ब्याह करौ, ब्याहन कौ चलाऔ करौ, ब्याहन को पुत्र दो.. अपनी मनोकामनाओं की अभिव्यक्ति करते हैं।
मंदाकिनी में झिलमिल आभा..
चित्रकूट में देवोत्थान एकादशी के दिन शाम होते-होते मंदाकिनी के तट की छटा अपने आपमें निराली हो जाती है। दो प्रदेशों की सीमाओं में विभक्त चित्रकूट के घाटों पर चहल-पहल बढ़ जाती है। शाम को घाटों को सुंदर दीपकों से सजाने के साथ ही रंगोली और फूल-पत्तियों से अपना कला-कौशल दिखाने का मौका आता है, तो लोग उसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। दोनो तरफ के घाटों में सुंदर सजावट के बाद प्रतिदिन होने वाली गंगा आरतियों के साथ ही जब विभिन्न गायकों की स्वर लहरिया वाद्य यंत्रों की धुनों पर निकलती हैं, तो लगता है कि अध्यात्म के जरिए चित्रकूट की लोककला कितनी समृद्ध हो रही है।
कई दशक से मध्य प्रदेश क्षेत्र के नयागाव स्टेट में मंदाकिनी तट पर इस दिन देव दीपावली महोत्सव आयोजित करने वाले राज परिवार के चौबे राजा तेज भान सिंह व चौबे राजा हेमराज सिंह कहते हैं, 'चित्रकूट में दीपावली का पर्व वास्तव में इसी दिन देव दीपावली के रूप में मनाया जाता है। पुरखों ने यहा पर मंदाकिनी के किनारे हर आम और खास के लिये वषरें पहले देव दीपावली को ही दीपावली के स्वरूप में मनाना शुरू किया था। मंदाकिनी के घाटों को दीपकों व रंगोली से सजाने के साथ ही यहा सुप्रसिद्ध लोक गायकों की गायकी का आनंद लोग उठाते हैं। इस दिन चित्रकूट में देश भर से लोग यहा के उत्सव में शामिल होने आते हैं और यहा की समृद्ध लोक-संस्कृति की प्रशसा करते हैं।