अपने पिता दरबारी लाल पटेल के साथ व भाई के साथ रवि नंदन

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रविवार, 27 मार्च 2011

सृजन की नयी धारा का नाम है डफ की फाग

जागरण विशेष

- संरक्षण करने के प्रयास में लगे हैं लोग
चित्रकूट, संवाददाता: चित्रकूट की धरती स्रजन की धरती मानी जाती है और जब लोभ, मोह, माया, मत्सर, तृष्णा और तमाम सांसारिक वस्तुओं का त्याग चुके वीतरागी संतों के हाथ में फागुन के महीने में सुबह भगवान की आरती के बाद हाथ में ढपली आती है तो उनके मुंह से श्री राम-मां जानकी व श्री कृष्ण और राधा जी के होली में डूबे हुये गीत सुनाई देने लगते हैं। उमंग और उल्लास अपने आप जब छा जाता है तो उन्हें इस बात का जरा भी भान नही होता कि वे बैठे कहां हैं और क्या कर रहे हैं। इन दिनों धर्मनगरी के कई मंदिरों पर फगुवा गाने का दौर कुछ इसी अंदाज में चल रहा है।
धर्मनगरी की अपनी विलक्षणता के कारण यहां की स्थानीय भाषा में गाये जाने वाले फाग के रंग भी देश भर से अलग हैं। कामतानाथ पर्वत के उत्तरी दिशा में बसे गांव कामतन के रहने वाले संत राम भरोसे तिवारी उल्लसित होकर रघुनंदन खेलत होली ' को जब अपनी साधुक्कड़ी भाषा में गाते हैं तो शमा कुछ दूसरी ही हो जाती है। कामता गांव के ही कृष्ण गोपाल पयासी कहते हैं चित्रकूट की फाग में जो लचक है वह लचक और लोच दूसरी विधा में दिखाई नही देती। घेर कामता बने हैं दिवाला, चित्रकूट निज धाम हमको पियारौ लागै रामा धाम जैसे अनगिनत गीत जब उनके स्वरों में गूंजते हैं तो सुनने वाले अपने आप तालियां बजाने को मजबूर हो जाते हैं। गनेश प्रसाद पटेल ,डा. अशोक त्रिपाठी, ब्रज किशोर पांडेय, भूपेन्द्र पांडेय, श्याम द्विवेदी व बीरू द्विवेदी आदि जब ढपली, खडताल, ढोलक, झांझ और नगड़ियां में जब होली खेलत रघुवीरा गाते हैं तो वातावरण जीवंत हो उठता है।
बजरंग आश्रम के संत निर्भय दास बताते हैं कि चित्रकूट की डफ फाग वास्तव में विलुप्त होने के कगार पर है। हाल के वर्षो से इसे संरक्षित किये जाने का काम चल रहा है। पुराने और नये लोगों के सम्मिश्रण से अब आगे का लोगों को प्रेरित कर इस विधा को गाने के लिये प्रेरित किया जा रहा है।
लोक लय समारोह के कर्ताधर्ता समाजसेवी गोपाल भाई कहते हैं कि चित्रकूट की थाती है साधुक्कड़ी शैली में ढपली की सहायता से गाये जाने वाली फाग। इसको संरक्षित करने के लिये लोग अब आगे आने लगे हैं। लोकगीतों की कोई प्रचलित स्वरलिपि न होने के कारण तमाम विधायें गायब होने के कगार पर हैं। उन्हीं में एक यह भी है। इस बार होली के तुरन्त बाद होने वाले लोकलय में चित्रकूट की डफ फाग का विशेष प्रदर्शन होगा।



लोकगीत है फिल्मी गीत को हिट कराने का फार्मूला

चित्रकूट, संवाददाता: महंगाई डायन खाय जात है तो एक नमूना है .मुन्नी बदनाम हुई के साथ ही हिट हुये गानों की श्रंखला देखिये और फिर कहिये कि क्या यह पिट सकते हैं। अरे भइया लोक धुनें तो हमारी थाती हैं इन्हें सहेजकर ही कर्णप्रिय मैटेरियल बाहर आ सकता है। इसके लिये हमें गांवों में जाकर लोक कलाकारों की पहचान करनी पड़ेगी उनको संरक्षण देने के उपाय करने पड़ेगे। तब जाकर बुंदेली हो या फिर अन्य कोई लोक विधा तभी जाकर वास्तविक गरीबों को लाभ मिल पायेगा।

बातचीत में उरई से आईं लोक कला मर्मग्य की उपाधि से विभूषित बुंदेली संगीत में शोध करने वाली डाक्टर वीणा श्रीवास्तव इतनी मुखर हो उठी कि उन्होंने पंजाब, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र के संगीत से बुंदेली संगीत के पिछड़ने का कारण यहां के कलाकारों को मान लिया। उन्होंने वर्तमान व्यवस्था पर भी चोट करते हुये कहा कि लोक संगीत की थाती को सहेजकर रखने वाले अधिकतर लोग गांव से आते हैं। शहर में उन्हें पिछड़ा माना जाता है। अब कलाकार दो वक्त की रोटी के लिये जद्दोजहद करें या फिर अपने गले व हाथों से आपको मधुर स्वर लहरियां सुनायें। वैसे पिछले सात साल के सूखे ने तो यहां के लोगों के साथ ही संगीत की भी चूल्हें हिला कर रख दी वह तो भला हो आमिर खान का जिनके कानों में बुंदेली के अब मशहूर हो चुके गारी विधा के गीत 'सखि सईयां तो बहुतई कमात हैं मंहगाई डायन खाय जात है' को ओरिजनल कंपोजिशन में डालकर प्रस्तुत किया गया और बुंदेली संगीत को संजीवनी मिल गई।
अब यहां पर कलाकारों को संरक्षण देने के लिये सरकार के साथ ही सामाजिक संस्थाओं को आगे आना होगा जिससे कलाकारों के पेट रोटी के इंतजाम के साथ ही उचित प्रशिक्षण की व्यवस्था हो सके। लगातार सेमिनारों और प्रशिक्षण सत्रों से यहां के बुंदेली संगीत का भला हो सकेगा।



यहां पर स्थापित है नाथ संप्रदाय की पहली गादी

चित्रकूट, संवाददाता: 'हानि लाभ जीवन मरण यश अपयश विधि हाथ' भले ही यह लाइनें गोस्वामी तुलसीदास ने साढे़ पांच सौ साल पहले ही लिखी हों पर वास्तव में इन शब्दों के गूढ़ मायने चित्रकूट की धरती पर पांच हजार साल पहले ही व्यक्त किये जा चुके थे। कैलाश पर्वत पर भगवान शंकर से दीक्षा के लेने के बाद जब स्वामी मच्कि्षन्द्र नाथ को विश्व भ्रमण का आदेश मिला तो उनके कदम चित्रकूट पहुंचकर थम गये। यहां की प्राकृतिक सुषमा और विविधता से वह इतने प्रभावित हुये कि उन्होंने अपनी पहली गादी यहीं स्थापित कर दी। यहीं चित्रकूट में अनुसुइया के जंगलों पर उन्हें अपने सुयोग्य शिष्य के रूप में गोरखनाथ भी मिल गये। गादी की स्थापना करने के साथ गुरु गोरखनाथ को कैलाश ले जाकर अपनी दिव्य शक्तियां देने के बाद वे वहीं पंच तत्वों में विलीन हो गये। गुरु गोखरनाथ ने स्यामल नाथ को अपना शिष्य बनाया। उन्होंने भी गुप्त नाथ को अपना शिष्य बनाया। गुरु गुप्त नाथ के समय नाथ संप्रदाय के इस प्रथम तीर्थ का विस्तार काफी तेजी से हुआ। पूरे देश से यहां पर आने वाले ज्ञान पिपासु अपनी ज्ञान साधना को पूर्ण करते रहे वहीं उन्होंने यहां पर व्यंकटेश भगवान की मूर्तियों के विग्रहों की स्थापना कर भगवान बाला जी के मंदिर की स्थापना की। नाथ संप्रदाय की पहली गादी को चित्रकूट में होने की मान्यता यहां पर महाराज गुप्त नाथ के समय ही मिली। यह परंपरा परमहंस नाथ, ब्रह्ममनन्द नाथ, माधव नाथ से बढ़कर अब वर्तमान गुरु योगेश्यवरानंद मंगलनाथ तक आ पहुंची है।

नाथ संप्रदाय के प्रमुख आचार्य योगेश्यवरानंद मंगलनाथ जी महाराज कहते हैं कि नाथ संप्रदाय का मतलब किसी को डराना नही बल्कि सभी प्राणियों में सद्गुणों को विस्तारित करना है। हर व्यक्ति में भगवान का अंश है। उसे किसी का डर नही होना चाहिये। मनुष्य को हानि लाभ जीवन मरण यश और अपयश तो विधि के विधान के अनुरूप ही मिलता है पर साधना वास्तव में उसे सभी कष्टों में खड़ा रहने की कला सिखाती है। जीवन संग्राम में विजय पथ का रास्ता केवल साधना से ही संभव है। आदि नाथ भगवान शंकर के डमरू से निकला ओंकार आज भी उतना ही प्रभावी है जितना प्रभावी वह स्वामी मच्छिन्द्र नाथ जी के समय पर था। वे कहते हैं कि दर्शन ही सभी प्रकार के ज्ञान और विज्ञान की मां है। अगर दर्शन नही होता तो किसी प्रकार की वस्तुओं का जन्म ही नही होता। खुद को शांत रखने के लिये वे साधना करने पर बल देते हैं और थोड़ा समय अपने लिये निकाल लेने पर ऐसा करना संभव बताते हैं।

पेयजल समस्या से निपटने के लिये प्रशासन ने कसी कमर

सर्वाधिक गांव हैं मानिकपुर ब्लाक में

-पहाड़ी ब्लाक में हो सकती है इस बार ज्यादा दिक्कत
चित्रकूट, संवाददाता: अब तो प्यास को लेकर मारामारी की स्थिति पैदा होने ही वाली है। पानी की समस्या को लेकर ऐसे हालत बनते जा रहे हैं कि आने वाले दिन भयावह होने वाले हैं। वैसे सरकारी आंकड़ों में पेयजल समस्या के मामले में मानिकपुर ब्लाक को जहां सर्वाधिक संवेदनशील घोषित किया गया है वहीं मंदाकिनी के सूख जाने के बाद अब तो तो तिरहार क्षेत्र में इस बार दिक्कतें काफी बढ़ सकती हैं। वैसे दो दिन पहले ही मुख्यालय के समीपवर्ती गांव में हैंडपम्पों के जवाब देने के कारण जल निगम को पानी सप्लाई देने के लिये रात में टयूब बेल चलाये जाने के निर्देश खुद जिलाधिकारी ने दिये हैं। फिलहाल जल निगम ने प्यासों को पानी देने के लिये अभी से अपनी कमर कस ली है। पिछले सालों की तरह ही इस साल भी टैंकरों के सहारे प्यासों की प्यास को बुझाने का इंतजाम किया जायेगा। इस योजना में लगभग 69 लाख रुपयों के खर्च होने का स्टीमेट बनाया है।
जल निगम अस्थायी शाखा के परियोजना प्रबंधक डी के शुक्ला बताते हैं कि पानी को लेकर अभी से कार्य योजना बनाकर उसकी स्वीकृति विभागीय स्तर पर ले ली गई है। मानिकपुर ब्लाक के इटवां गांव से पानी की दिक्कत होने की पहली शिकायत आयी है। सर्वे के लिये अधिकारियों को भेजा गया है। अगर जरूरत होगी तो टैंकर से पानी की सप्लाई प्रारंभ कर दी जायेगी।
उन्होंने बताया कि खुटहा, रैपुरवा माफी, घुरेटनपुर, मानपुर यादव के डेरा में, रसिन मजरा -चक्कला, ब्यूर, छिवलहा, गौशाला, महोदव व रसिन गांव में हरिजन बस्ती, ग्राम पंचायत बैहार मजरा डोकहा पुरवा, भभई, महराजपुर, बकटा बुजुर्ग, इटौरा, कपना, पथरामानी, पहाड़ी कस्बा व कर्का पडरिया का मजरा वेटन का पुरवा व कोलहाई, उमरी का मजरा बगीचा का पुरवा, डांडी व कोलान, किहुनिया का मजरा पयासी पुरवा, ऊंचाडीह का मजरा गढ़वा, टेढुवा, झलमल, कोलान,गुलरियापुरवा, डोडामाफी का मजरा सोसायटी कोलान, गोपीपुर , ग्राम सेमरदहा, खांचा पुरवा, गदरहापुरवा, खैराहनपुरवा, कोटा कदैला का मजरा हडहाई पुरवा, चूल्ही, रामपुर कल्याणगढ़, ददरी माफी का मजरा छोटी बिलहरी, बराह माफी, सरहट मानिकपुर देहात, सकरौंहा, अमचुर नेरूआ, कोटा कदैला का मजरा कदैला पुरवा, सिंगवन पुरवा, रूकमा बुजुर्ग का मजरा खांचा पुरवा, टिकरिया मजरा जमुनिहाई, निही मजरा भाटा, सिमरधा बडौदा, मारकुंडी डांडी कोलान, महुलिया, टंकी पुरवा, भभरा पुरवा, खिरवा पुरवा, चमरवा पुरवा, इटवां, महुलिया व देवरा आदि गांवों को आने वाले समय में पेयजल किल्लत होने वाले संभावितों में शामिल कर लिया गया है। टैंकरों की व्यवस्था भी कर ली गई है। पीने के पानी की समस्या की जानकारी मिलने पर तुरन्त ही टैंकर भेज दिये जायेंगे।



अगले साल चित्रकूट में होगा श्री राम यज्ञ

चित्रकूट, संवाददाता: भगवान राम बाबा भोलेनाथ की पूजा करते हैं तो शंकर भी हर समय भगवान राम का ही जप करते हैं। आध्यात्म की इस बड़ी गुत्थी को सही सिद्ध करने का काम नाथ संप्रदाय के साधकों द्वारा चित्रकूट की धरती पर अगले साल किया जायेगा। योगाभ्यानंद मंगलनाथ महाराज ने अगले साल की चैत्र राम नवमी को बाला जी मंदिर में श्री राम यज्ञ किये जाने की घोषणा की। शनिवार को नाथ संप्रदाय के प्रमुख योगाभ्यानंद मंगलनाथ महाराज ने अपने शिष्यों को संदेश देते हुये कहा कि अब उनके जीवन के पचहत्तर बंसत बीत चुके हैं और भारतीय दर्शन की आश्रम व्यवस्था की डोर उन्हें सन्यास आश्रम में जाने के लिये कह रही है। इसलिये अब पूर्ण रूप से वे भगवा वस्त्र धारण कर सन्यासी के वेश में रहकर सभी को आत्म कल्याण के साथ ही पूरे विश्व के कल्याण के गुर सिखाते रहेंगे। इसके साथ ही उन्होंने वर्ष 2012 में चित्रकूट में नाथ संप्रदाय की पहली गादी पर चैत्र माह की राम नवमी को श्री राम यज्ञ करने की घोषणा की। इस दौरान टाउन हाल पर बाहर से आये स्थानीय हजारों भक्तों की मौजूदगी में नव नाथ यज्ञ की पूर्णाहुति हुई। इसके पूर्व मंगलनाथ महाराज ने भगवान भोले नाथ का रूद्राभिषेक करने के साथ ही नारायण स्त्रोत का पाठ किया।
इस दौरान व्यवस्था का गुरुतर भार उठाने में आनंद राव तैलंग, श्री रंग परस पारखी, नरेन्द्र केवले, अतुल पांडरीकर, मधुकर राव नायगांवकर, पद्माकर चोरधरे, कु. भालेन्द्र सिंह, श्री राम पांडेय, सुरेश राम हरि जोग, इन्द्र कुमार त्रिपाठी व गोबिंद पयासी आदि लोग शामिल रहे।

..तो नहीं बदल सकी अलंकृत उद्यान की दशा

चित्रकूट, संवाददाता: मंशा तो थी कि यहां पर लोग सुबह और शाम की ताजी हवा खाकर अपने आपको स्वस्थ रखे। कार्य योजना भी बनी। बड़ी-बड़ी बातें हुई और पत्थर लगाकर काम को शुरू करने का दावा भी किया गया पर शहर के बच्चे, बूढे और जवान इसका इंतजार ही करते रह गये कि कब यह योजना पूरी होगी और औषधियों से युक्त ताजी हवा में उन्हें टहलने का मौका मिलेगा। पिछले आठ सालों से जिलाधिकारी आवास के पीछे की जमीन पर अलंकृत उद्यान की योजना को पूरा किया जाने से ज्यादा टरकाने का काम ज्यादा दिखाई देता है। महत्वपूर्ण बात तो यह है कि यह एक ऐसा स्थान है जिसमें एक बार नही दो बार एक ही काम के लिये शुभारंभ जिलाधिकारियों ने किया पर उनके द्वारा तैयार करवाई गई कार्ययोजना अभी तक पूरी नही हो सकी।

पिछले आठ सालों में अलंकृत उद्यान को अलग-अलग तरह से दो बार उद्घाटन होने के बाद भी अभी यह पार्क डरावनी जगह के तौर पर ही जाना जाता है। गौरतलब है कि जिला बनने के बाद जिलाधिकारी जगन्नाथ सिंह ने सबसे पहले इस खाली पड़ी जमीन की चिंता व्यक्त की थी। उन्होने पहली बार उद्यान विभाग को लगभग एक हेक्टेयर का पूरा रकबा राजकीय उद्यान बनाने के लिये दिलवाया था। उनकी मंशा थी कि यहां पर न केवल अच्छे फल और फूलों वाले पौधों का उत्पादन किया जाये और इसे घूमने के पार्क के रूप में विकसित किया जाये।
वर्ष 2003 में तत्कालीन जिलाधिकारी राम सूरत दुबे ने यहां पर अलंकृत उद्यान की परिकल्पना कर 13 मई को इसका विधिवत शुभारंभ किया। उनकी कार्ययोजना में बच्चों के लिये पार्क जिसमें झूले लगे हों और बड़ों के टहलने के लिये पाथ वे तथा औषधीय पौधों की प्रचुरता वाले पार्क का निर्माण हो। बच्चों के मनोरंजन के लिये झूले और अन्य समान तो लगाये गये पर औषधियों से भरा बगीचा अलंकृत उद्यान नही बन सका। इसके बाद आये जिलाधिकारियों ने इसकी सुधि नही ली। इसके बाद वर्ष 2009 में पूर्व जिलाधिकारी हृदेश कुमार ने फिर से एक बार रूचि लेकर एक जुलाई को राजकीय अलंकृत उद्यान में बागवानी के शुभारंभ का काम कर दिया। जिला उद्यान अधिकारी धीरेन्द्र मिश्र ने बताया अलंकृत उद्यान में पिछले साल काफी पौधे लगवाये गये थे। अभी पौधों के बढ़ने में समय है। फिर भी उनकी देखरेख के लिये लोग लगे हैं जल्द ही पार्क का स्वरूप दिखाई देगा।




बुधवार, 23 मार्च 2011

पानी की कमी से जूझ रहे पाठा के कलाकार

चित्रकूट, संवाददाता : एक नही आश्चर्य करने के कई कारण फिर भी रहा वही रोना? तीर्थनगरी के प्रवेश द्वार रानीपुर भट्ट के अखिल भारतीय समाज सेवा संस्थान के भारत जननी परिसर में परिसर में चौथे लोकलय समारोह में आये पाठा के कलाकारों ने मंच पर गाते और थिरकते हुये भले ही उत्साह और उमंग से लबरेज रहे हों पर मंच से उतरने के बाद जब उनसे उनके इलाके में पीने के पानी की समस्या पर जागरण ने सवाल पूंछे तो उनका दर्द चेहरों पर साफ उभर आया।
मानिकपुर के पाठा क्षेत्र के गांव सरहट, गोपीपुर , करौंहा, टिकरिया, जमुनिहाई, छोटी व बड़ी पाटिन व मोटवन आदि गांवों से आये कलाकारों ने रूंधे गले से पानी की कमी की बात कही।
टिकरिया के रहने वाले राजाराम, आनंद, सुधा व संगीता ने कहा कि हैंडपम्पों ने साथ छोड़ना प्रारंभ कर दिया है। कुंये और तालाब तो पहले ही बरबाद हो चुके थे। अब तो केवल चोहड़ों का भरोसा है।
मारकुंडी की रहने वाली गीता, सुमन ने कहा कि अभी तो हैंडपम्पों में रूक-रूक कर पानी आ रहा है लेकिन जल्द ही यह जवाब दे जायेगे फिर तो तीन किलोमीटर दूर चोहडे से पानी भरना उनकी मजबूरी होगी।
उमेश, संजू, सुखराम, सुधा आदि ने तो इस बार की होली को पानी की कमी के कारण फीका बताते हुये कहा कि आने वाले दिनों में स्थिति क्या होगी क्योंकि अभी तो पूरी गर्मी ही पड़ी हुई है। उन्होंने कहा कि वे देहाती कलाकार हैं अगर सरकार वास्तव में उनका भला चाहती है तो अन्य योजनाओं के पहले पानी पिलाने की योजना पर काम करे जिससे कम से कम वे जिंदा तो रह सकें।

अभी तो जारी है इकतारे की यात्रा

चित्रकूट, संवाददाता: 'तन तंबूरा तार मन अद्भुत है यह साज, मन के हाथों बंध चला मन की है आवाज' भगवान श्री कृष्ण की भक्ति वाल्सल्य के रूप में करने वाले महाकवि सूरदास हों या फिर स्वामी हरिदास दोनों ने अपनी भक्ति का माध्यम इकतारे को ही बनाया। भक्ति कालीन परंपरा के साथ ही लोकगायकों को जब नादस्वरम के रूप में जब तंबूरे से स्वर मिले तो उनकी आवाजों का पैना पन बढ़ या। इतना ही नही सितार और गिटार का जनक इकतारे को भले ही आज बड़े संगीत कारों ने विलुप्ति की श्रेंणी में रख छोड़ा हो पर अभी भी बुंदेली विधाओं के गीत संगीत में तो इसका व्यापक प्रयोग दिखाई देता है। एक ही तार पर तबूरे के माध्यम से हवा में जो स्वर उत्पन्न होते हैं उन्हें नादस्वर मानने वाले कलाकार तो कहते हैं कि यह तो भगवान शंकर का प्रसाद है। क्योकि डमरू को पहला वाद्ययंत्र माना जाता है और उसमें भी डोरी तो कसी जाती है। इसकी सहायता से ही स्वर मिलता है। जो आवाज को स्थायित्व देने का काम करता है।

बांदा के बडोखर से आये कलाकार छोटे लाल व पर्वत लाल कहते कि इकतारे का प्रयोग तो पहले काफी फिल्मों में भी किया गया। आज भी कभी-कभी इसके सुरों का उपयोग दिखाई देता है। वैसे समय की मार के चलते सस्ता किंतु उपयोगी वाद्ययंत्र अब समाप्त होने की कगार पर है। इसको संरक्षण देने की आवश्यकता है।