जागरण विशेष
- संरक्षण करने के प्रयास में लगे हैं लोग
चित्रकूट, संवाददाता: चित्रकूट की धरती स्रजन की धरती मानी जाती है और जब लोभ, मोह, माया, मत्सर, तृष्णा और तमाम सांसारिक वस्तुओं का त्याग चुके वीतरागी संतों के हाथ में फागुन के महीने में सुबह भगवान की आरती के बाद हाथ में ढपली आती है तो उनके मुंह से श्री राम-मां जानकी व श्री कृष्ण और राधा जी के होली में डूबे हुये गीत सुनाई देने लगते हैं। उमंग और उल्लास अपने आप जब छा जाता है तो उन्हें इस बात का जरा भी भान नही होता कि वे बैठे कहां हैं और क्या कर रहे हैं। इन दिनों धर्मनगरी के कई मंदिरों पर फगुवा गाने का दौर कुछ इसी अंदाज में चल रहा है।
धर्मनगरी की अपनी विलक्षणता के कारण यहां की स्थानीय भाषा में गाये जाने वाले फाग के रंग भी देश भर से अलग हैं। कामतानाथ पर्वत के उत्तरी दिशा में बसे गांव कामतन के रहने वाले संत राम भरोसे तिवारी उल्लसित होकर रघुनंदन खेलत होली ' को जब अपनी साधुक्कड़ी भाषा में गाते हैं तो शमा कुछ दूसरी ही हो जाती है। कामता गांव के ही कृष्ण गोपाल पयासी कहते हैं चित्रकूट की फाग में जो लचक है वह लचक और लोच दूसरी विधा में दिखाई नही देती। घेर कामता बने हैं दिवाला, चित्रकूट निज धाम हमको पियारौ लागै रामा धाम जैसे अनगिनत गीत जब उनके स्वरों में गूंजते हैं तो सुनने वाले अपने आप तालियां बजाने को मजबूर हो जाते हैं। गनेश प्रसाद पटेल ,डा. अशोक त्रिपाठी, ब्रज किशोर पांडेय, भूपेन्द्र पांडेय, श्याम द्विवेदी व बीरू द्विवेदी आदि जब ढपली, खडताल, ढोलक, झांझ और नगड़ियां में जब होली खेलत रघुवीरा गाते हैं तो वातावरण जीवंत हो उठता है।
बजरंग आश्रम के संत निर्भय दास बताते हैं कि चित्रकूट की डफ फाग वास्तव में विलुप्त होने के कगार पर है। हाल के वर्षो से इसे संरक्षित किये जाने का काम चल रहा है। पुराने और नये लोगों के सम्मिश्रण से अब आगे का लोगों को प्रेरित कर इस विधा को गाने के लिये प्रेरित किया जा रहा है।
लोक लय समारोह के कर्ताधर्ता समाजसेवी गोपाल भाई कहते हैं कि चित्रकूट की थाती है साधुक्कड़ी शैली में ढपली की सहायता से गाये जाने वाली फाग। इसको संरक्षित करने के लिये लोग अब आगे आने लगे हैं। लोकगीतों की कोई प्रचलित स्वरलिपि न होने के कारण तमाम विधायें गायब होने के कगार पर हैं। उन्हीं में एक यह भी है। इस बार होली के तुरन्त बाद होने वाले लोकलय में चित्रकूट की डफ फाग का विशेष प्रदर्शन होगा।
- संरक्षण करने के प्रयास में लगे हैं लोग
चित्रकूट, संवाददाता: चित्रकूट की धरती स्रजन की धरती मानी जाती है और जब लोभ, मोह, माया, मत्सर, तृष्णा और तमाम सांसारिक वस्तुओं का त्याग चुके वीतरागी संतों के हाथ में फागुन के महीने में सुबह भगवान की आरती के बाद हाथ में ढपली आती है तो उनके मुंह से श्री राम-मां जानकी व श्री कृष्ण और राधा जी के होली में डूबे हुये गीत सुनाई देने लगते हैं। उमंग और उल्लास अपने आप जब छा जाता है तो उन्हें इस बात का जरा भी भान नही होता कि वे बैठे कहां हैं और क्या कर रहे हैं। इन दिनों धर्मनगरी के कई मंदिरों पर फगुवा गाने का दौर कुछ इसी अंदाज में चल रहा है।
धर्मनगरी की अपनी विलक्षणता के कारण यहां की स्थानीय भाषा में गाये जाने वाले फाग के रंग भी देश भर से अलग हैं। कामतानाथ पर्वत के उत्तरी दिशा में बसे गांव कामतन के रहने वाले संत राम भरोसे तिवारी उल्लसित होकर रघुनंदन खेलत होली ' को जब अपनी साधुक्कड़ी भाषा में गाते हैं तो शमा कुछ दूसरी ही हो जाती है। कामता गांव के ही कृष्ण गोपाल पयासी कहते हैं चित्रकूट की फाग में जो लचक है वह लचक और लोच दूसरी विधा में दिखाई नही देती। घेर कामता बने हैं दिवाला, चित्रकूट निज धाम हमको पियारौ लागै रामा धाम जैसे अनगिनत गीत जब उनके स्वरों में गूंजते हैं तो सुनने वाले अपने आप तालियां बजाने को मजबूर हो जाते हैं। गनेश प्रसाद पटेल ,डा. अशोक त्रिपाठी, ब्रज किशोर पांडेय, भूपेन्द्र पांडेय, श्याम द्विवेदी व बीरू द्विवेदी आदि जब ढपली, खडताल, ढोलक, झांझ और नगड़ियां में जब होली खेलत रघुवीरा गाते हैं तो वातावरण जीवंत हो उठता है।
बजरंग आश्रम के संत निर्भय दास बताते हैं कि चित्रकूट की डफ फाग वास्तव में विलुप्त होने के कगार पर है। हाल के वर्षो से इसे संरक्षित किये जाने का काम चल रहा है। पुराने और नये लोगों के सम्मिश्रण से अब आगे का लोगों को प्रेरित कर इस विधा को गाने के लिये प्रेरित किया जा रहा है।
लोक लय समारोह के कर्ताधर्ता समाजसेवी गोपाल भाई कहते हैं कि चित्रकूट की थाती है साधुक्कड़ी शैली में ढपली की सहायता से गाये जाने वाली फाग। इसको संरक्षित करने के लिये लोग अब आगे आने लगे हैं। लोकगीतों की कोई प्रचलित स्वरलिपि न होने के कारण तमाम विधायें गायब होने के कगार पर हैं। उन्हीं में एक यह भी है। इस बार होली के तुरन्त बाद होने वाले लोकलय में चित्रकूट की डफ फाग का विशेष प्रदर्शन होगा।



