शुक्रवार, 16 जुलाई 2010
भगवान जगन्नाथ के दर्शन को उमड़े भक्त
चित्रकूट। गुंडीचा धाम (सोनेपुर) में खड़ा भगवान जगन्नाथ स्वामी का रथ और उस पर विराजमान श्री बलभद्र जी व मां सुभद्रा जी की झांकी को देखकर लोग भाव हो रहे थे। जहां नवयुवक और नवयुवतियां लच्छेदार और सोनपापड़ी का प्रसाद लेकर अपनी मन्नतें पूरी कराने को पहुंचे वहीं अधिक उम्र की महिलाओं के मुंह से 'भले विराजे जू उड़ीसा जगन्नाथ पुरी में भले बिराजे जू' की लाइनें निकल पड़ी। साल में एक बार सोनेपुर गांव का प्राइमरी स्कूल गुंडीचा धाम में परिवर्तित हो उठा। शाम के समय मेला भरने के समय तो सोनेपुर, गढ़ीवा, तरौंहा, सिद्धपुर, बनाड़ी सहित आसपास के हजारों लोगों का हुजूम ठाकुर जी के रथ के सामने सीस नवाने और परिक्रमा कर अपनी मन्नतें मांगने के लिये पहुंचने लगे थे। काफी देर तक लोगों ने मां जानकी के आने का भी इंतजार किया। मां जानकी की पालकी लगभग सात बजे शाम पहुंची।
शुक्रवार को वेदपाठी ब्राह्मणों के द्वारा वेदों की रिचाओं की जगह लोग खेल तमाशों में व्यस्त और बाजार हाट का काम कर रहे थे। चाट पकौड़ी के साथ ही महिलाओं के सौंदर्य प्रसाधन की सामग्री बिक रही थी। इसके साथ बच्चे गुब्बारे खरीदने और झूला झूलने का काम कर रहे थे।
शुक्रवार को वेदपाठी ब्राह्मणों के द्वारा वेदों की रिचाओं की जगह लोग खेल तमाशों में व्यस्त और बाजार हाट का काम कर रहे थे। चाट पकौड़ी के साथ ही महिलाओं के सौंदर्य प्रसाधन की सामग्री बिक रही थी। इसके साथ बच्चे गुब्बारे खरीदने और झूला झूलने का काम कर रहे थे।
भगवान जगन्नाथ को मनाने आयीं जानकी
चित्रकूट। राम और कृष्ण एक हैं। इस बात का अद्भुत साम्य श्री रथ यात्रा पर दिखाई देता है। यहां के चौथे दिन गुंड़ीचा धाम में जब श्री विष्णु के अवतार जगत के नाथ जगन्नाथ को रूठने के बाद मनाने के लिये मां अन्नपूर्णा जानकी को आने की बात सुन थोड़ा आश्चर्य होता है। क्योंकि जब भगवान विष्णु के अंश जगन्नाथ स्वामी को तो मनाने के लिये मां राधा को आना चाहिये पर यहां पर उद्बोधन व डोली में सजी मां जानकी दिखाई पड़ती हैं। मुख्यालय से सटे हुये सोनेपुर गांव के प्राइमरी स्कूल में लगा विशाल मेला और वहां पर लगातार भक्तों की उमड़ती भीड़ इस बात की गवाही देती है कि आधुनिकता के इस दौर में भी पुरानी धार्मिक परंपराओं से जुड़ी बातें कितनी सच हैं। चित्रकूट में आकर मां राधा जानकी जी में परिवर्तित हो जाती हैं।
इस सवाल का जवाब बाबा रमाशंकर कुछ ऐसे अंदाज में देते हैं कि भगवान राम हो या फिर भगवान कृष्ण दोनो ही श्री हरि विष्णु के अंश माने जाते हैं जबकि मां राधा और मां जानकी को भी श्री लक्ष्मी का अवतार माना जाता है। अब इस राममय चित्रकूट में जब सब कुछ राम के नाम पर ही होता है तो मां राधा को जानकी के नाम से पुकारने में क्या बुराई है। वैसे नाम कोई भी लिये जायें हैं तो सब परमात्मा के ही नाम।
इस सवाल का जवाब बाबा रमाशंकर कुछ ऐसे अंदाज में देते हैं कि भगवान राम हो या फिर भगवान कृष्ण दोनो ही श्री हरि विष्णु के अंश माने जाते हैं जबकि मां राधा और मां जानकी को भी श्री लक्ष्मी का अवतार माना जाता है। अब इस राममय चित्रकूट में जब सब कुछ राम के नाम पर ही होता है तो मां राधा को जानकी के नाम से पुकारने में क्या बुराई है। वैसे नाम कोई भी लिये जायें हैं तो सब परमात्मा के ही नाम।
बुधवार, 7 जुलाई 2010
20 जून को होगा श्री राम वन गमन पथ संग्रहालय का लोकार्पण
चित्रकूट। जहां एक तरफ गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने श्री राम चरित मानस लिखकर श्री राम के चरित्र को जन-जन तक पहुंचा कर अमर कर दिया और अब श्री राम सांस्कृतिक शोध संस्थान के निदेशक डा. राम अवतार शर्मा ने उन स्थलों की खोज कर डाली जहां-जहां कभी प्रभु श्री राम ने वनवास काल में चरण रखे थे।
श्री कामदगिरि परिक्रमा पर श्री राम वन पथ गमन संग्रहालय के लोकार्पण कार्यक्रम के संयोजक डा. राम नारायण त्रिपाठी बताते हैं कि प्रभु श्री राम ने अपने जीवन काल में दो वन यात्रायें कीं। पहले वन गमन की यात्रा अयोध्या से जनकपुर तक की थी और दूसरी अयोध्या से श्री लंका की। डा. शर्मा ने भी इन दोनो वन यात्राओं को खुद किया और 299 स्थलों की खोज की। हर एक स्थान के दुर्लभ व नवीनतम चित्रों का संग्रह किया। उन्होंने अपनी अधिकतर यात्रायें साइकिल से की। बताया कि चित्रकूट में इन सब दुर्लभ चित्रों को एक साथ दिखाने के लिये संग्रहालय भरत मिलाप के महंत राम मनोहर दास द्वारा दान दी गई जमीन पर किया जा रहा है। 20 जून को भंडारे के साथ लोकार्पण काम प्रारंभ होगा। शाम के लोकार्पण सत्र की मुख्य अतिथि किष्किंधा की राजमाता चंद्रकांता देवी होंगी व अध्यक्षता राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के क्षेत्र संघ चालक श्री कृष्ण माहेश्वरी करेंगे।
उन्होंने बताया कि भगवान श्री राम, मां जानकी व भ्राता लक्ष्मण ने अपने वन वास काल का सर्वाधिक समय 11 वर्ष 8 माह व 25 दिन चित्रकूट में ही व्यतीत किया इसलिये डा. शर्मा ने चित्रकूट को ही संग्रहालय बनाने के लिये उपयुक्त स्थान माना।
श्री कामदगिरि परिक्रमा पर श्री राम वन पथ गमन संग्रहालय के लोकार्पण कार्यक्रम के संयोजक डा. राम नारायण त्रिपाठी बताते हैं कि प्रभु श्री राम ने अपने जीवन काल में दो वन यात्रायें कीं। पहले वन गमन की यात्रा अयोध्या से जनकपुर तक की थी और दूसरी अयोध्या से श्री लंका की। डा. शर्मा ने भी इन दोनो वन यात्राओं को खुद किया और 299 स्थलों की खोज की। हर एक स्थान के दुर्लभ व नवीनतम चित्रों का संग्रह किया। उन्होंने अपनी अधिकतर यात्रायें साइकिल से की। बताया कि चित्रकूट में इन सब दुर्लभ चित्रों को एक साथ दिखाने के लिये संग्रहालय भरत मिलाप के महंत राम मनोहर दास द्वारा दान दी गई जमीन पर किया जा रहा है। 20 जून को भंडारे के साथ लोकार्पण काम प्रारंभ होगा। शाम के लोकार्पण सत्र की मुख्य अतिथि किष्किंधा की राजमाता चंद्रकांता देवी होंगी व अध्यक्षता राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के क्षेत्र संघ चालक श्री कृष्ण माहेश्वरी करेंगे।
उन्होंने बताया कि भगवान श्री राम, मां जानकी व भ्राता लक्ष्मण ने अपने वन वास काल का सर्वाधिक समय 11 वर्ष 8 माह व 25 दिन चित्रकूट में ही व्यतीत किया इसलिये डा. शर्मा ने चित्रकूट को ही संग्रहालय बनाने के लिये उपयुक्त स्थान माना।
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