चित्रकूट। 'न होगा कपड़ा तो पैरों से पेट को ढक लेंगे' कवि दुष्यंत की कही गई ये पंक्तियां भले ही इन पर पूरी तरह से सही न बैठती हो पर तन ढकने के कपड़े के अलावा रहने का ठिकाना और पेट भरने को दो वक्त की रोटी के लिये गर्मी, सर्दी और बरसात के समय चल रही इनकी मशक्कत को देखकर तो यही लगता है कि जिंदगी का सबसे कड़वा सच यही है। कबाड़ बीनकर अपने पेट की आग को ठड़ा करने के काम में लगा राजू जैसे कितने ही नाम सभ्य समाज के मुंह पर तमाचा मारने का काम कर रहे हैं।
सभ्य समाज के मुंह पर तमाचा मारने का काम करने वाले ये असभ्य समझे जाने वाले लोग कभी किसी प्राथमिक स्कूल की दहलीज तक नही पहुंचे। जानकारी के नाम पर रुपयों की पहचान के अलावा इन्हें व्यक्ति के अच्छे और बुरे होने की पहचान है। वैसे कच्ची उम्र में ही कमाई का बोझ सिर पर आ जाने के कारण इन्हें नशे की भी लत आसानी से लग जाती है। नशे का सहारा लेने के लिये चोट के लिये उपयोग में लाई जाने वाली क्रीमों के साथ ही बोरेक्स, बूट पालिश और अन्य दवाओं को को ये ब्रेड में लगाकर खाते हैं। रोटी खाने के नाम बताते हैं कि महीनों पहले होटल पर दाल और रोटी खाई थी। अधिकतर समय ब्रेड और चाय पर ही गुजर जाता है।
समाजसेवी राजेश सोनी कहते हैं कि वास्तव में युवा पीढ़ी का यह हाल देखकर काफी दुख होता हे। स्वयं सेवी संगठन द्वारा संचालित सरकार द्वारा वित्त पोषित इन बच्चों के लिये चलने वाले स्कूल कहां पर चलते हैं यह तो किसी को भी नही मालूम। सरकार का इन बच्चों के हितों के लिये आया बजट उदरस्थ करने में समाजसेवी गौरव महसूस करते हैं।
रविवार, 27 जून 2010
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