चित्रकूट। जहां एक तरफ सतना जिला प्रशासन ने आगे आकर मंदाकिनी की सफाई को लेकर जनसहयोग से स्फटिक शिला में काम शुरु करा दिया है। इसमें ग्रामोदय विश्वविद्यालय के साथ ही नेहरु युवा केंद्र के स्वयंसेवियों ने सहयोग भी जुटे हैं।
मंदाकिनी में सफाई अभियान सतना जिला प्रशासन ने पहले भी कराया था। जी हां पिछले साल पांच जून से लेकर बीस जून तक बड़ी मशीन लगाकर जिला प्रशासन द्वारा करवाई गई सफाई बरबाद हो गयी। मंदाकिनी पुल के पास एक मीटर गहरा और चौहत्तर मीटर चौड़ा पाट एक बार फिर से संकरा दिखाई देने के साथ ही काफी उथला दिखाई देने लगा है। नदी की गहराई कम होने का कारण वनस्पतियों का उगना भी है। नदी में एक बार फिर से बेकार वनस्पतियों ने कब्जा जमा लिया है।
पूर्व सभासद अरुण गुप्ता कहते हैं कि यहां पर दोबारा गंदगी पनपने की मुख्य वजह जन चेतना का आभाव है। नदी में मल मूल और कचरा आज भी बहाया जा रहा है। जो वास्तव में नदी में गंदगी को बढ़ाने का वाहक है। उन्होंने मांग किया कि नदी ही चित्रकूट को पहले पालीथीन से मुक्त कराने के लिये सरकार को पहल करनी चाहिये और इसको कानूनी जामा पहनाकर बंद कराना चाहिये।
गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010
बुधवार, 10 फ़रवरी 2010
मंगलवार, 9 फ़रवरी 2010
शनिवार, 6 फ़रवरी 2010
खेती के विविधीकरण प्रयोग का माहिर रविनंदन
चित्रकूट। उसने हालिया रिलीज 'थ्री इडियट' तो नही देखी पर उसके कारनामे तो कुछ अलग हटकर ही हैं। पहले इंटरमीजिएट की पढ़ाई अधूरी छोड़कर पालीटेक्निक करने चला गया और फिर जब उसमें मन नही लगा तो अपने घर में आकर खेती में हाथ अजमाने लगा। खेती में जब मुख्यालय के समीपवर्ती गांव बरवारा के रवीनंदन सिंह ने हाथ अजमाया तो उसने पिता का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया। जहां एक तरफ कृषि के साथ ही विविधीकरण के सभी प्रयोग वह अपने भाई व पिता के सहयोग से खेतों पर कर रहा है, वहीं उसने इस साल की पहली तारीख को अपना नाम जिले की लिस्ट में पहला नाम मधुमक्खी पालन के लिये दर्ज करा दिया है। भले ही वह पालीटेक्निक पूरी न कर पाया हो पर आज भी आसपास के गांव वाले उसे 'जेई साहब' के नाम से ही पुकारते हैं।
उन्नतशील कृषि के लिये दूसरों के लिये आदर्श बन चुके रविनंदन पर भी कृषि विभाग भी मेहरबान है। इस साल की पहली ही तारीख को अपने आलू लगे खेत पर चालीस डिब्बों के साथ मधुमक्खी पालन करने की शुरुआत करने वाला रवि बताता है कि कम्पनी बाग इलाहाबाद में डेढ़ माह के प्रशिक्षण के बाद बाराबंकी से पाश्चात्य मौन मक्खी, फ्रेम और डिब्बे लाकर काम शुरु कर दिया। फिलहाल तो खेतों पर गेंदा है जो मधुमक्खी 'लक्ष्मी' को काफी पसंद है पर इसी हफ्ते सात सौ पौधे गुलाब के भी रोप दिये जायेंगे। कहता है कि पिता दरबारी लाल की जमीन थी, पालीटेक्निक में पढ़ने लायक कुछ समझ नही आया तो क्या करता। दो साल बाद वापस आया तो देखा कि पिता जी इतनी मेहनत करते हैं और लाभ नही हो रहा फिर अपने हिसाब से काम करने को पिता को तैयार किया। पहले बाग लगाया। यहां पर आंवला, अमरुद, करौंदा, आम, करौदा, सागौन व बेल के पौधों का रोपण किया। दो ही साल में करौंदा, आंवला व अमरुद ने फल देना प्रारंभ किया तो करौंदा व आंवला बिकने लगा। केवल एक तरह का ही फल एक पेड़ से न लेने वाले इस होनहार नौजवान ने एक पेड़ पर ही दूसरी वैरायटी की कई किस्में और तैयार कर डाली। आज एक ही पेड़ पर आंवले की कई किस्में दिखाई दे रही है।
जब इस किसान को कृषि विभाग के लिये अधिकारियों के साथ ही राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन का साथ मिला तो गेंहू के साथ गन्ना, चना, अलसी, अरहर, जौ, सरसों तो उगा ही डाला साथ ही टमाटर, मिर्च, लहसुन, प्याज, पालक, मेथी, आलू, के अलावा मिर्च, जीरा, अजवाइन, सौंफ के साथ हल्दी की पैदावार कर डाली। उसने बताया कि इस पूरे काम में उसकी कुल तीस बीघे जमीन में उसे दस से बारह लाख की सलाना आमदनी हो रही है।
उप निदेशक कृषि मो. आरिफ सिद्दीकी कहते हैं कि एक ही व्यक्ति खेती में इतनी विविधता लाकर काम दिखा रहा है। वास्तव में यह दूसरों के लिये प्रेरणा स्रोत है।
दरबारी लाल कहते हैं कि पहले तो कि रवि की बात पर यकीन नही हुआ। वह पढ़ने से भाग जाता था पर अब वह अपने भाई राम मूरत के साथ खेती में इतना कमा रहा है कि गुजारा मजे से चल रहा है।
जिला कृषि अधिकारी एच एन सिंह कहते हैं कि विभाग भी इस किसान की हर तरह से मदद करता है। समय पर बीज व खाद तो दिया ही जा रहा है। साथ ही इसने जिप्सम और जई को भी बोकर जहां अपने जानवरों को दुधारु बनाया है वहीं ऊसर खेत को भी काफी हद तक सुधार लिया है। एनआरएचएम के जिला सलाहकार रामहंस सिंह भी यहां पर लगातार अपनी समझ देते रहते हैं।
उन्नतशील कृषि के लिये दूसरों के लिये आदर्श बन चुके रविनंदन पर भी कृषि विभाग भी मेहरबान है। इस साल की पहली ही तारीख को अपने आलू लगे खेत पर चालीस डिब्बों के साथ मधुमक्खी पालन करने की शुरुआत करने वाला रवि बताता है कि कम्पनी बाग इलाहाबाद में डेढ़ माह के प्रशिक्षण के बाद बाराबंकी से पाश्चात्य मौन मक्खी, फ्रेम और डिब्बे लाकर काम शुरु कर दिया। फिलहाल तो खेतों पर गेंदा है जो मधुमक्खी 'लक्ष्मी' को काफी पसंद है पर इसी हफ्ते सात सौ पौधे गुलाब के भी रोप दिये जायेंगे। कहता है कि पिता दरबारी लाल की जमीन थी, पालीटेक्निक में पढ़ने लायक कुछ समझ नही आया तो क्या करता। दो साल बाद वापस आया तो देखा कि पिता जी इतनी मेहनत करते हैं और लाभ नही हो रहा फिर अपने हिसाब से काम करने को पिता को तैयार किया। पहले बाग लगाया। यहां पर आंवला, अमरुद, करौंदा, आम, करौदा, सागौन व बेल के पौधों का रोपण किया। दो ही साल में करौंदा, आंवला व अमरुद ने फल देना प्रारंभ किया तो करौंदा व आंवला बिकने लगा। केवल एक तरह का ही फल एक पेड़ से न लेने वाले इस होनहार नौजवान ने एक पेड़ पर ही दूसरी वैरायटी की कई किस्में और तैयार कर डाली। आज एक ही पेड़ पर आंवले की कई किस्में दिखाई दे रही है।
जब इस किसान को कृषि विभाग के लिये अधिकारियों के साथ ही राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन का साथ मिला तो गेंहू के साथ गन्ना, चना, अलसी, अरहर, जौ, सरसों तो उगा ही डाला साथ ही टमाटर, मिर्च, लहसुन, प्याज, पालक, मेथी, आलू, के अलावा मिर्च, जीरा, अजवाइन, सौंफ के साथ हल्दी की पैदावार कर डाली। उसने बताया कि इस पूरे काम में उसकी कुल तीस बीघे जमीन में उसे दस से बारह लाख की सलाना आमदनी हो रही है।
उप निदेशक कृषि मो. आरिफ सिद्दीकी कहते हैं कि एक ही व्यक्ति खेती में इतनी विविधता लाकर काम दिखा रहा है। वास्तव में यह दूसरों के लिये प्रेरणा स्रोत है।
दरबारी लाल कहते हैं कि पहले तो कि रवि की बात पर यकीन नही हुआ। वह पढ़ने से भाग जाता था पर अब वह अपने भाई राम मूरत के साथ खेती में इतना कमा रहा है कि गुजारा मजे से चल रहा है।
जिला कृषि अधिकारी एच एन सिंह कहते हैं कि विभाग भी इस किसान की हर तरह से मदद करता है। समय पर बीज व खाद तो दिया ही जा रहा है। साथ ही इसने जिप्सम और जई को भी बोकर जहां अपने जानवरों को दुधारु बनाया है वहीं ऊसर खेत को भी काफी हद तक सुधार लिया है। एनआरएचएम के जिला सलाहकार रामहंस सिंह भी यहां पर लगातार अपनी समझ देते रहते हैं।
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